गांधी
ग्राम और पंचायती व्यवस्था
भारत एक प्राचीन देश है जिसकी संस्कृति
और व्यवस्था भी उतनी ही पुरानी है जितना की यह देश जो सिन्धु से हिंदुस्तान में परिवर्तित
हुआ । भारत में पंचायती राज व्यवस्था का इतिहास 5000 वर्ष पुराना है। जिसका सबसे
प्राचीन वर्णन ऋग्वेद में मिलता है। आज की विषम परिस्थितियों में ग्राम सभा की
जिम्मेदारी में सभी की भागीदारी हो तभी ग्रामीण धरातल पर कुछ हो सकता है । ग्राम सभा
ही एक ऐसा मंच है जहां एक ऐसे वातावरण की कल्पना की जा सकती है जो सही अर्थों में
प्रत्यक्ष व सहभागी लोकतंत्र सुनिश्चित कराता है। साथ ही हमेशा से उपेक्षा के शिकार रहे गरीबों
को भी ग्राम पंचायत के प्रस्तावों पर विचार करने का थोड़ा बहुत मौका तो देता ही है
। इस व्यवस्था में सभी को आलोचना करने, स्वीकारने-अस्वीकारने व इसके कार्यप्रदर्शन
का आकलन कर अपनी राय देने का भी अधिकार मिलता है।
गाँधी ने भारत के बारे में कहा है। ‘‘भारत गाँवों
का देश है। यहाँ की आत्मा गाँवों में
निवास करती है।’’ महात्मा गाँधी
का यह कथन ग्रामीण विकास के उद्देश्य एवं महत्व पर बल देता है। ठीक उसी प्रकार
ग्रामीण अंचलों का विकास किये बिना भारत वैश्विक आर्थिक विकास की दौड़ में अग्रणी
नहीं हो सकता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुये आर्थिक नियोजन प्रणाली के
प्रारंभ से ही भारत की पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण विकास को सदैव प्राथमिकता
प्रदान की गयी। इसका एक प्रमुख कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था का देश की अर्थव्यवस्था
में विशेष महत्व एवं योगदान होना है। चाहे वह कृषि उत्पादन हो या फिर लघु
उद्योगों से प्राप्त उत्पादन हो। नियोजन
काल के पिछले पाँच दशकों में ग्रामीण विकास हेतु अनेक कार्यक्रम एवं परियोजनायें
आरंभ की गयी। रोजगारपरक तथा गरीबी उन्मूलक कार्यक्रम चलाये गये। पंचायती राज व्यवस्था
के माध्यम से नीचे से ऊपर की ओर (From Grassroots Planning) नियोजन पद्धति व विकेंद्रीकरण को अपनाने के प्रयास जारी हैं।
ग्राम-स्तर
पर विकास-कार्यक्रमों का संचालन। नेतृत्व एवं क्रियान्वयन ग्रामीणों के हाथ में
सौंपा गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु एवं कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना। ग्रामीण सुख सुविधाओं का विस्तार। निवेशकों का ग्रामीण क्षेत्रों की ओर आकर्षित
करना आदि इसमें शामिल है ।अनेक प्रयासों के फलस्वरूप भारत आज 21वीं शताब्दी में प्रवेश
कर चुका है।ग्रामीण क्षेत्र को दूरसंचार ,बैंक, बीमा, परिवहन, सिंचाई आदि अनेक सुविधाओं से तेजी से जोड़ा
गया है। जिससे ग्रामीण जन-जीवन में एक नई
क्रांति का स्रोत फूटा है। साथ ही आर्थिक स्तर भी ऊपर उठा है। विगत वर्षों में ग्रामीण विकास हेतु
अनेक प्रयास हुये हैं परंतु इन प्रयासों का प्रभाव जितना अधिक मात्रात्मक रूप में
पड़ा है। उतना सुधार गुणात्मक रूप में देखने को नहीं मिला है। प्राचीन काल से ही भारतवर्ष के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में
पंचायत का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सार्वजनिक जीवन का प्रत्येक पहलू इसी के
द्वारा संचालित होता था।
प्राचीन काल
वैदिक काल में भी पंचायतों का अस्तित्व था। ग्राम के
प्रमुख को ग्रामणी कहते थे। उत्तर वैदिक काल में भी यह होता था जिसके माध्यम से
राजा ग्राम पर शासन करता था। बौद्धकालीन ग्रामपरिषद् में "ग्राम वृद्ध"
सम्मिलित होते थे। इनके प्रमुख को "ग्रामभोजक" कहते थे। परिषद् अथवा
पंचायत ग्राम की भूमि की व्यवस्था करती थी तथा ग्राम में शांति और सुरक्षा बनाए
रखने में ग्रामभोजक की सहायता करती थी। जनहित के अन्य कार्यों का संपादन भी वही
करती थी। स्मृति ग्रंथों में भी पंचायत का उल्लेख है। कौटिल्य ने ग्राम को राजनीतिक इकाई माना है। "अर्थशास्त्र" का "ग्रामिक" ग्राम का प्रमुख
होता था जिसे कितने ही अधिकार प्राप्त थे। अपने सार्वजनिक कर्तव्यों को पूरा करने
में वह ग्रामवासियों की सहायता लेता था। सार्वजनिक हित के अन्य कार्यों में भी
ग्रामवासियों का सहयोग वांछनीय था। ग्राम की एक सार्वजनिक निधि भी होती थी जिसमें
जुर्माने, दंड आदि से धन आता था। इस प्रकार ग्रामिक और
ग्रामपंचायत के अधिकार और कर्तव्य सम्मिलित थे जिनकी अवहेलना दंडनीय थी। गुप्तकाल में ग्राम शासन की सबसे छोटी इकाई
था जिसके प्रमुख को "ग्रामिक" कहते थे। वह "पंचमंडल" अथवा
पंचायत की सहायता से ग्राम का शासन चलाता था। "ग्रामवृद्ध" इस पंचायत के
सदस्य होते थे। हर्ष ने भी इसी व्यवस्था को अपनाया। उसके समय में राज्य "भुक्ति"
(प्रांत), "विषय" (जिला) और
"ग्राम" में विभक्त था। हर्ष के मधुबन शिलालेख में सामकुंडका ग्राम का
उल्लेख है जो "कुंडघानी" विषय और "अहिछत्र" भुक्ति के अंतर्गत
था। ग्रामप्रमुख को ग्रामिक कहते थे।
मध्य काल-
नवीं और दसवीं
शताब्दी के चोल और उत्तर मल्लूर शिलालेखों से पता चलता है कि दक्षिण में भी पंचायत
व्यवस्था थी। ग्राम्य स्वशासन का विकास चोल शासन की मुख्य विशेषता थी। इन साम्य
शासन इकाइयों को "कुर्रुम" कहते थे,
जिनमें कई ग्राम सम्मिलित होते थे।
कुर्रुम एक स्वायत्तशासी इकाई थी। शासनसत्ता एक महासभा में निहित होती थी जिले
ग्राम के लोग चुनते थे सभा अपनी समितियों के माध्यम से शासन का काम चलाती थी। इस
प्रकार की आठ समितियाँ थीं जो जनहित के विभिन्न कार्यों को करने के अतिरिक्त शांति
और सुरक्षा बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थीं। ये न्याय संबंधी कार्य भी करती थीं।
ग्राम पूरी तरह स्वायत्तशासी था और इस प्रकार केंद्रीय शासन अनेक दायित्वों से
मुक्त रहता था। मुस्लिम और मराठा कालों में भी किसी न किसी प्रकार की पंचायत
व्यवस्था चलती रही और प्रत्येक ग्राम अपने में स्वावलंबी बना रहा।
ब्रिटिश काल-
अंग्रेजी
शासनकाल में पंचायत-व्यवस्था को सबसे अधिक धक्का पहुँचा और वह यह व्यवस्था
छिन्न-भिन्न हो गई। फिर भी ग्रामों के सामाजिक जीवन में पंचायतें बनी रहीं।
प्रत्येक जाति अथवा वर्ग की अपनी अलग-अलग पंचायतें थीं जो उसके सामाजिक जीवन को
नियंत्रित करती थीं और पंचायत की व्यवस्था एवं नियमों का उल्लंघन करनेवाले को कठोर
दंड दिया जाता था। शासन की ओर से इन पंचायतों के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया
जाता था। आरंभ से ही अंग्रेजों की नीति यह रही कि शासन का काम, यथासंभव, अधिकाधिक राज्य कर्मचारियों के
हाथों में ही रहे। इसके परिणामस्वरूप फौजदारी और दीवानी अदालतों की स्थापना, नवीन राजस्व नीति, पुलिस व्यवस्था, गमनागमन के साधनों का विकास आदि कारणों से ग्रामों का स्वावलंबी जीवन और
स्थानीय स्वायत्तता धीरे-धीरे समाप्त हो चली।
परंतु आगे चलकर अंग्रेजों ने भी यह
अनुभव किया कि उनकी केंद्रीकरण की नीति से शासनभार दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा
है। दूसरी ओर राष्ट्रीय जाग्रति के कारण स्वायत्तशासन की माँग भी बढ़ रही थी। अतएव
उन्हें विकेंद्रीकरण की दिशा में कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा। प्रारंभ में जिला
बोर्डों और म्युनिसिपल बोर्डों की स्थापना की गई। सन् 1907 के विकेंद्रीकरण संबंधी
शाही कमीशन ने पंचायतों के महत्व को स्वीकर किया और अपनी रिपोर्ट में लिखा कि किसी
भी स्थायी संगठन की नींव, जिससे जनता का सक्रिय सहयोग
प्रशासन के साथ हो, ग्रामों में ही होनी चाहिए। कमीशन
ने सिफारिश की कि कुछ चुने हुए ग्रामों में,
जो पारस्परिक दलबंदी और झगड़ों से
मुक्त हों, पंचायतें स्थापित की जाएँ और प्रारंभ में
उन्हें सीमित अधिकार दिए जाएँ। तत्कालीन भारत सरकार ने 1915 ई. में कमीशन की
सिफारिशों को सिद्धांतत: तो स्वीकर कर लिया परंतु व्यवहार में उनकी पूर्णतया
उपेक्षा की गई। बहुत ही कम ग्रामों में पंचायतें बनी;
जो बनीं, वे भी सरकार द्वारा पूरी तरह नियंत्रित थी।
भारत सरकार के
1919 मे अधिनियम के अनुसार प्रांतीय सरकारों को स्वशासन के कुछ अधिकार दिए गए और
1920 के आसपास सभी प्रांतों में ग्राम पंचायत अधिनियम बनाए गए। संयुक्त प्रदेश
(उत्तर प्रदेश) में 1920 के पंचायत ऐक्ट के अधीन लगभग 4700 ग्राम पंचायतें स्थापित
की गईं। सभी प्रांतों में पंचायतों को सीमित अधिकार दिए गए। वे जनस्वास्थ्य, स्वच्छता, चिकित्सा, जलविकास, सड़कों,
तालाबों कुओं आदि की देखभाल करती
थीं। उन्हें न्याय संबंधी कुछ अधिकार भी प्राप्त थे। वे अधिकतम 200 रु. की चल
संपत्ति से संबद्ध मुकदमे ले सकती थीं और फौजदारी के मुकदमों में 50 रु. तक
जुर्माना कर सकती थीं। इनकी आय का मुख्य साधन जुर्माना या दान था। परंतु
वास्तविकता यह रही कि प्राचीन पंचायतों की तुलना में ये पंचायतें पूर्णतया
प्रभावहीन थीं, इनके पंच जनता द्वारा न चुने जाकर
सरकार द्वारा मनोनीत किए जाते थे तथा आय के साधन न होने के करण इनकी आर्थिक स्थिति
शोचनीय थी। दूसरी ओर राष्ट्रीय आंदोलन के कर्णधार यह अनुभव करते थे कि गाँवों का
आर्थिक और नैतिक पतन केवल पंचायतों की पुन: स्थापना द्वारा ही रोका जा सकता है। गांधी जी के ग्रामों के लिए दससूत्री कार्यक्रम में
पंचायतों को सुदृढ़ बनाने की बात मुख्य थी। वे पंचायतों को स्वंतत्र भारत की
शासनव्यवस्था की आधारशिला बनाना चाहते थे। 1937 में सात प्रांतों में स्थापित
कांग्रेसी सरकारों के सामने भी यही आदर्श था। उत्तर प्रदेश में अनेक ग्रामों में जीवनसुधार समितियाँ (Better Life Societies) बनाई गई जिन्हें ग्रामविकास के कार्य सौंपे गए।
स्वतंत्रताप्राप्ति
के बाद-
इस प्रकार 1947
ई. तक ग्रामों में सही पंचायत व्यवस्था का अभाव ही रहा। स्वतंत्रताप्राप्ति के
पश्चात् इस व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के सक्रिय प्रयास आरंभ हुए। उत्तर प्रदेश
में सन् 1947 में पंचायत राज अधिनियम बनाया गया। संविधान के अंतर्गत "राजनीति
के निदेशक तत्वों" में राज्य का यह प्रमुख कर्तव्य बतलाया गया कि "वह
ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए अग्रसर हो" तथा "उनको ऐसी शक्तियाँ
और अधिकार प्रदान करे जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने
योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों"। इस निदेश के अनुसार प्रत्यक राज्य में
पंचायत व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम उठाए गए और प्रत्येक ग्राम अथवा
ग्रामसमूह में पंचायत की स्थापना की गई। पंचायत के सदस्यों का चुनाव गाँव के
मताधिकारप्राप्त व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। ग्राम पंचायतें ग्राम की
स्वच्छता, प्रकाश,
सड़कों,
औषधालयों, कुओं की सफाई और मरम्मत, सार्वजनिक भूमि, पैठ, बाजार तथा मेलों और चरागाहों की व्यवस्था करती
हैं, जन्म मृत्यु का लेखा रखती हैं और खेती, उद्योग धंधों एवं व्यवसायों की उन्नति,
बीमारियों की रोकथाम, श्मशानों और कब्रिस्तानों की देखभाल भी करती हैं। वृक्षारोपण, पशुवंश का विकास, ग्रामसुरक्षा के लिए ग्रामसेवक दल
का गठन, सहकारिता का विकास, अकाल पीड़ितो की सहायता, पुलों और पुलियों का निर्माण, स्कूलों और अस्पतालों का सुधार आदि
इनके ऐच्छिक कर्तव्य हैं। ग्रामों में पंचायत व्यवस्था का दूसरा अंग न्याय
पंचायतें हैं। ग्रामों में मुकदमेबाजी कम करने तथा जनता को सस्ता न्याय सुलभ बनाने
की दृष्टि से न्याय पंचायतों का निर्माण किया गया है। इन्हें दीवानी, फौजदारी, और माल के मामलों में कुछ अधिकार
प्रदान किए गए है। प्रत्येक राज्य में पंचायतों के अधिकार और दायित्व न्यूनाधिक
रूप से समान है।
विकेंद्रीकरण व्यवस्था को पूरी तरह कार्यान्वित
करने की दिशा में और भी कदम उठाए गए हैं। पंचायतों के अधिकारों और कर्तव्यों का
क्षेत्र विस्तृत हो रहा है। इस प्रकार ग्राम पंचायतें पुन: हमारे देश के जनजीवन का
अभिन्न अंग बन गई हैं। इस व्यवस्था की सफलता के लिए जनशिक्षा, सामूहिक चेतना, गुटबंदी का अभाव, राज्य द्वारा कम से कम हस्तक्षेप आदि बातें आवश्यक हैं।
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ग्रामीण विकास मंत्रालय- भारत सरकार के मंत्रालयों में से एक है। सन 1974 के दौरान यह 'ग्रामीण विकास विभाग खाद्य और
कृषि मंत्रालय' के अंग के रूप में अस्तित्व में
आया था। मंत्रालय के नाम को समय-समय पर परिवर्तित भी किया गया। मार्च, 1995 के दौरान इस
मंत्रालय का नाम बदलकर 'ग्रामीण क्षेत्र तथा रोज़गार
मंत्रालय' रखा गया था। यह मंत्रालय व्यापक कार्यक्रमों
का कार्यान्वयन करके ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव लाने के उद्देशय से एक
उत्प्रेरक मंत्रालय का कार्य करता आ रहा है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य गरीबी
उन्मू्लन, रोज़गार सृजन,
अवसंरचना विकास
तथा सामाजिक सुरक्षा आदि है।
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अभिप्राय - 'ग्रामीण विकास' का अभिप्राय एक ओर जहाँ लोगों का
बेहतर आर्थिक विकास करना है, वहीं दूसरी ओर वृहत सामाजिक
कायाकल्प भी करना है। ग्रामीण लोगों को आर्थिक विकास की बेहतर संभावनाएँ मुहैया
कराने के उद्देश्य से ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में लोगों की उत्तरोत्तर भागीदारी
सुनिश्चित करने, योजना का विकेन्द्रीकरण करने, भूमि सुधार को बेहतर ढंग से लागू करने और ऋण प्राप्ति का दायरा बढ़ाने का
प्रावधान किया गया है। प्रारंभ में कृषि उद्योग,
संचार,
शिक्षा,
स्वास्थ्य तथा इससे संबंधित क्षेत्रों
के विकास पर मुख्य बल दिया गया था, लेकिन बाद में यह महसूस किया गया
कि त्वरित विकास केवल तभी संभव हो सकता है,
जब सरकारी प्रयासों में बुनियादी
स्तर पर लोगों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी हो। इसीलिए 31 मार्च, 1952 को समुदाय
परियोजना प्रशासन के रूप में ज्ञात एक संगठन की योजना आयोग के अधीन स्थापित की गई, जिसका कार्य सामुदायिक विकास से संबंधित कार्यक्रमों का संचालन करना था।
सामुदायिक विकास कार्यक्रम का उद्घाटन 2 अक्तूबर, 1952 को किया गया था
और यह कार्यक्रम ग्रामीण विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान था।
स्थापना- यह मंत्रालय दो विभागों से मिलकर बनता है- 'ग्रामीण विकास विभाग' और 'भूमि संसाधन विभाग'। अक्तूबर, 1974 के दौरान 'ग्रामीण विकास विभाग', 'खाद्य और कृषि मंत्रालय' के अंग के रूप में यह मंत्रालय अस्तित्व में आया। 18 अगस्त, 1979 को 'ग्रामीण विकास विभाग' का दर्जा बढ़ा कर उसे 'ग्रामीण पुनर्गठन मंत्रालय' का नाम दिया गया। 23 जनवरी, 1982 को इस मंत्रालय
का नामकरण 'ग्रामीण विकास मंत्रालय' किया गया। जनवरी, 1985 के दौरान 'ग्रामीण विकास मंत्रालय' को फिर से 'कृषि तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय'
के अधीन एक विभाग के रूप में बदल
दिया गया, जिसे बाद में, सितम्बर, 1985 के दौरान 'कृषि मंत्रालय' का नाम दिया गया। 5 जुलाई, 1991 को इस विभाग को
पुन: 'ग्रामीण विकास मंत्रालय' का दर्जा दिया गया। 2 जुलाई, 1992 को इस मंत्रालय
के अधीन 'बंजर भूमि विकास विभाग' के नाम से एक और विभाग का गठन किया गया। मार्च, 1995 के दौरान इस
मंत्रालय का पुन: नाम बदलकर 'ग्रामीण क्षेत्र तथा रोज़गार
मंत्रालय' रख दिया गया और इसमें तीन विभाग भी शामिल किये
गये-
1.
'ग्रामीण रोज़गार तथा गरीबी उन्मूलन
विभाग'
2.
'ग्रामीण विकास विभाग'
3.
'बंजर भूमि विकास विभाग'
उद्देश्य - सन 1999 में 'ग्रामीण क्षेत्र तथा रोज़गार
मंत्रालय' का फिर से नाम बदलकर 'ग्रामीण विकास मंत्रालय' रखा गया। यह मंत्रालय व्यायपक
कार्यक्रमों का कार्यान्वमयन करके ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव लाने के उद्देशय से
एक उत्प्रेरक मंत्रालय का कार्य करता आ रहा है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य गरीबी
उन्मू्लन, रोज़गार सृजन,
अवसंरचना विकास तथा सामाजिक
सुरक्षा है। समय के साथ-साथ कार्यक्रमों के कार्यान्वअयन में प्राप्त अनुभव के
आधार पर तथा गरीब लोगों की जरूरतों का ध्यान रखते हुए,
कई कार्यक्रमों में संशोधन किये
गये और नये कार्यक्रम लागू किये गए। इस मंत्रालय का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण गरीबी
को दूर करना तथा ग्रामीण आबादी, विशेष रूप से गरीबी रेखा से नीचे
जीवन यापन कर रहे लोगों को बेहतर जीवन स्तर मुहैया करना है। इन उद्देश्यों की
पूर्ति ग्रामीण जीवन और कार्यकलापों के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित कार्यक्रमों
को तैयार करके, उनका विकास करके तथा उनका
कार्यान्वयन करके की जाती है। इस बात को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कि आर्थिक
सुधारों का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिले,
ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर
के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक तथा आर्थिक अवसंरचना के पांच कारकों की पहचान की गई-
1.
स्वास्थ्य
2.
शिक्षा
3.
पेयजल
4.
आवास
5.
सड़कें
इन क्षेत्रों में किये जा रहे
प्रयासों को और बढ़ाने के लिए सरकार ने 'प्रधानमंत्री ग्रामीण योजना' (पीएमजीवाई) शुरू की और 'ग्रामीण विकास मंत्रालय' को 'प्रधानमंत्री योजना'
(पीएमजीवाई) के निम्नलिखित भागों को
कार्यान्वित करने का दायित्व सौंपा-
·
पेयजल आपूर्ति
·
आवास निर्माण
·
ग्रामीण सड़कों का निर्माण करना
·
गरीबी उन्मूलन
कार्यक्रम- नौवीं योजना अवधि के दौरान कई गरीबी उन्मूलन
कार्यक्रमों का पुनर्गठन किया गया, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रह
रहे गरीब लोगों को लाभ देने के लिए कार्यक्रमों की दक्षता बढ़ाई जा सके। 'एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम' (आईआरडीपी), ग्रामीण क्षेत्रों में महिला और बाल विकास कार्यक्रम (डीडब्यूद सीआरए), ग्रामीण दस्तकारों को बेहतर औजारों की आपूर्ति से संबंधित कार्यक्रम
(एसआईटीआरए), स्व-रोज़गार के लिए ग्रामीण युवाओं
के प्रशिक्षण से संबद्ध कार्यक्रम (टीआरवाईएसईएम),
गंगा कल्याण योजना (जीकेवाई) तथा
मिलियन कूप स्कीम (एमडब्यूक एस) का विलय समग्र स्व-रोज़गार योजना में किया गया, जिसे स्वर्णजयंती ग्राम स्वय-रोज़गार योजना (एसजीएसवाई) का नाम दिया गया।
स्थानीय लोगों की जरूरतों और उनकी
आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए पंचायती राज संस्थाओं का सहयोग इस कार्यक्रम के
कार्यान्वयन में लिया गया। ये संस्थाएँ योजना तथा उसके कार्यान्वयन के
विकेन्द्रीकृत विकास का रूप हैं। मंत्रालय राज्य सरकारों से जोर देकर यह कह रहा है
कि वे पंचायती राज संस्थाओं को अपेक्षित प्रशासनिक तथा वित्तीय शक्तियाँ शीघ्र दें, जैसा कि भारत के 73वें संविधान संशोधन में कहा गया है। 25 दिसम्बर, 2002 को पेयजल
क्षेत्र के अधीन 'स्व-जलधारा' नामक नया कार्यक्रम शुरू किया गया,
जिसके अधीन पेयजल परियोजनाएँ तैयार
करने, उन्हें कार्यान्वित करने, उनका संचालन करने तथा उनका रख-रखाव करने की शक्तियाँ पंचायतों को देने का
प्रावधान है। पंचायती राज संस्थाओं का विकास प्रक्रिया में और सहयोग लेने के
उद्देश्य से प्रधानमंत्री द्वारा 27 जनवरी, 2003 को 'हरियाली' नामक एक नया कार्यक्रम शुरू किया
गया। हरियाली नामक कार्यक्रम शुरू करने का उद्देश्य बंजर भूमि विकास कार्यक्रमों
अर्थात 'आईडब्यूडीपी',
'डीपीएपी' और 'डीडीपी'
के कार्यान्वयन में पंचायती राज
संस्थाओं का सहयोग प्राप्त करना है।
ग्रामीण महिलाओं का सशक्तिकरण - ग्रामीण महिलाओं का सशक्तिकरण
ग्रामीण भारत के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। महिलाओं को विकास की मुख्य धारा में लाना
भारत सरकार का मुख्य दायित्व रहा है। इसलिए गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में महिलाओं
के योगदान का भी प्रावधान किया गया है, ताकि समाज के इस वर्ग के लिए
पर्याप्त निधियों की व्यवस्था की जा सके। संविधान (73वाँ) संशोधन अधिनियम, 1992 में महिलाओं के लिए चुनिन्दा पदों के आरक्षण की व्यावस्था है। भारतीय संविधान में आर्थिक विकास तथा सामाजिक न्याय से
संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों को तैयार करके निष्पादित करने का दायित्व पंचायतों को
सौंपा है, और कई केन्द्र प्रायोजित योजनाएँ पंचायतों के
ज़रिये कार्यान्वित की जा रही हैं। इस प्रकार पंचायतों की महिला सदस्यों और महिला
अध्यक्षों, जो बुनियादी रूप से पंचायतों की नई सदस्या हैं, को अपेक्षित कौशल प्राप्त करना होगा और उन्हें नेतृत्व का निर्वाह करने तथा
निर्णय में सहभागी होने के लिए अपनी उचित भूमिकाओं को निभाने हेतु उचित प्रशिक्षण
देना होगा। पंचायती राज संस्थाओ के चुनिंदा प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने का
दायित्व बुनियादी रूप से राज्य सरकारों,
संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों का
है। ग्रामीण विकास मंत्रालय राज्यों, संघ राज्य क्षेत्रों को भी कुछ
वित्तीय सहायता मुहैया कराता है, ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रमों के
स्तर को बेहतर बनाया जा सके और पंचायती राज संस्थाओं के चुने हुए सदस्यों और
कार्यकर्ताओं के लिए क्षमता निर्माण की पहल हो सके।
मंत्रालय के विभाग- मंत्रालय दो अंतर्राष्ट्रीय
संगठनों अर्थात 'सेंटर ऑन इंटीग्रेटिड रूरल
डेवलेपमेंट ऑफ़ एशिया एंड पेसिफ़िक' (सीआईआरडीएपी) तथा 'एफ़्रो-एशियन रूरल डेवलेपमेंट ऑर्गनाइजेशन'
(एएआरडीओ) के लिए नोडल विभाग है।
मंत्रालय के निम्नालिखित तीन विभाग हैं-
1.
ग्रामीण विकास विभाग
2.
भूमि संसाधन विभाग
3.
पेयजल और स्वच्छता विभाग
इस प्रकार यह व्यवस्था आज भी संचालित हो रही है ।
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