जनता का आदमी
Monday, January 14, 2013
वेणु गोपाल, की कविता की एक झलक
सोचता कोई नहीं। कोई नहीं सोचता मेरी
ओर से
कि खून की लकीर नहीं खींच सकती मेरी कलम
और स्याही से
कभी कोई बात साफ़ नहीं होती।
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