Friday, February 1, 2013

डायरी के कुछ पन्ने



कल ही कितना समझाया था 
पर आज देखती हूँ
वही स्थिति .....
खाली बेंच,
आखिर क्यों ?
वो समझ नही पाता ,
ये उसके लिए, 
अच्छा नही है |
क्यों इन सब बातो पर 
इतना परेशान होता है
क्यों हर बात कि 
सजा खुद को देता है|
आशा करती हूँ समझ जाये 
जिंदगी को जीना|
नहीं तो बोझिल जिंदगी को
आगे चलाना 
मुश्किल हो जायेगा |
डर लगता है जब
अखबार में पढ़ती हूँ
आज एक बच्चे ने .......
या उसने......
इस तरह कि कोई भी 
घटना दिमाग को 
परेशान कर देती है|
हर पल सोचने व 
समझने पर मजबूर 
कर देती है ....
कि कैसे वो छोटा 
सा बच्चा 
जिंदगी के प्रति इतना 
बेरहम हो सकता है |
कैसे ?
आखिर कैसे ?
ये सवाल मात्र 
मेरा सवाल नहीं
हर उस शख्स के 
मन में उठने 
वाला सवाल है 
जो उस खबर को
पढ़कर पैदा होता है|
जब मैंने
उसे देखा तो पहला 
डर मेरे मस्तिष्क में 
यही कौंधा 
कही यह भी तो.............
भावना