Thursday, January 31, 2013

परिवर्तन रूपी रथ का पहिया है युवा


 भावना 
परिवर्तन सतत चलने वाली क्रिया है| ‘Its the part of life and Art of life यह जीवन का हिस्सा भी है और जीवन जीने की कला भी| परिवर्तन प्रकृति की स्वाभाविक क्रिया भी है और नियम भी| वास्तविकता भी यही है की जीवन गतिशील है| जहाँ गतिहीनता है वहीं मृत्यु है| यदि परिवर्तन के सैदान्तिक पक्ष की बात करें तो यह ‘एक सार्वकालिक घटना है”, जो किसी न किसी रूप में हमेशा घटित होती रहती है और व्यवहारिक रूप में कहा जाये तो प्रकृति ने ही मनुष्य को जीवन दिया है| भले ही मनुष्य ने अपनी उपयोगिता के अनुसार परिवार, समाज, धर्म, राजनीति, न्याय व्यवस्था और नैतिक मूल्य जैसी संस्थाओ का निर्माण किया| समय के साथ समाज और परिवार से जुडी इन इकाइयों के स्वरूपों में भी अंतर आया| यह अंतर आज सामाजिक परिवर्तनों के रूप में भी जाना और समझा जा सकता है| जब हम परिवर्तन की बात करते है तो परिवर्तन का स्वरुप सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक,धार्मिक,नैतिक व भौतिक संबंधो में देखते है| जैसा की सामाजिक परिवर्तन को परिभाषित करते हुए समाजशास्त्रियों का कहना है-
मकीवर एवं पेज’(R.M Maclver and C.H.Page) के अनुसार “समाजशास्त्री के रूप में हमारा प्रत्यक्ष संबंध सामाजिक सम्बन्धों से है| इन सम्बन्धों में जो परिवर्तन आता है मात्र उसी को सामाजिक परिवर्तन कहेगे|”
डेविस’(K.Devis) के अनुसार सामाजिक परिवर्तन “सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न होता है| जिसे समाज की संरचना और प्रकार्य के रूप मे जाना जाता है|”
एच.एम जानसन(H.MJohnson) के अनुसार “सामाजिक परिवर्तनों से अभिप्राय सामाजिक संरचना में परिवर्तनों से है| [
आइ.एम.जिटलिन(I.M Zeitlin) के अनुसार “सामाजिक परिवर्तनों के अध्ययन का संबंध उन प्रक्रियाओ से है जिनके द्वारा समाज और संस्कृति में बदलाव आता है|”
व्यक्ति बदलता है तो समाज स्वतः ही बदलाव की और अग्रसर होता है यह भी कहाँ जा सकता है कि समाज व्यक्ति को बदलने पर मजबूर भी कर देता है| दोनों ही क्रियाएँ स्वाभाविक है| सामाजिक परिवर्तनों का स्वरूप भी कुछ ऐसा ही है| यह एक सामान नहीं होता है| यह दशा और दिशा के अनुरूप स्वयं को अलग–अलग रूपों में हमारे समक्ष रखता है| जैसे
  • सामाजिक परिवर्तन एक ‘विश्वव्यापी प्रक्रिया’(Universal Process) है| यह दुनिया में हर समय घटित होता  है|
  •  यह‘एक रेखीय(Unilinear) तो कभी बहुरेखीय(Multi linear)है| विज्ञान के अन्तर्गत हुए आविष्कारो को एक रेखीय’(Unilinear) के अन्तर्गत रखा जा सकता है|
  •  सामाजिक परिवर्तनों की गति अनियमित तथा सापेक्षित (Irregular and Relative) होती है| अर्थात समाज की  विभिन्न इकाइयों के बीच गति एक समान नहीं होती है|
  •  सामाजिक परिवर्तनों में परिवर्तन की प्रकृति ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जाने की  होती है; जिसे  उतार-चढ़ाव परिवर्तनों (Fluctuating Changes) के नाम से जाना जाता है| उदाहरण के लिए समाज का  आध्यात्म से क्षण के महत्त्व की और बढ़ता झुकाव और हर पल को जीने की बढती चाहत उतार-चढ़ाव परिवर्तनों का ही एक रूप कहाँ जा सकता है|
उपरोक्त सामाजिक परिवर्तनों के स्वरूप पर चर्चा करते हुए “मकीवर एवं पेज”सामाजिक परिवर्तनों के अन्तर्गत एकरेखीय , उतार-चढ़ाव परिवर्तन व तरंगीय परिवर्तन की बात करते है तो “बोंट्मोर” परिवर्तन के स्रोतों ,परिवर्तन होने की पूर्वावस्था, परिवर्तन की गति व परिवर्तन योजनाबद्ध है या आकस्मिक के आधार पर परिवर्तनों की चर्चा करते है| 
सामाजिक परिवर्तनों के कारक (Factor Of Social Change)
सामाजिक परिवर्तनों के अनेक कारक है जो किसी न किसी रूप में समाज को प्रभावित करते आ रहे है| सामाजिक परिवर्तनों के आधार पर ही हम युवा को भी भली-भांति समझ भी सकते है| जिसके संदर्भ में हम आगे चर्चा करेगें| उससे पहले सामाजिक परिवर्तनों के कारकों को समझना अनिवार्य है| समाजशास्त्रियों के आधार पर सामाजिक परिवर्तन –
एच.एम जानसन परिवर्तनों के स्रोतों के आधार पर सामाजिक परिवर्तन को तीन रूपों में बताते है-1.आंतरिक कारक(Internal Factor), 2.बाह्य करक (External Factor), 3. गैर-सामाजिक पर्यावरण (Non Social Movement)|
ऐन्थनी गिडेन्स ने सामाजिक परिवर्तनों के कारकों का उल्लेख करते हुए इसके तीन कारक बताये-1.भौतिक पर्यावरण, 2.राजनीतिक व्यवस्था और 3. संस्कृति |
मकीवर और पेज ने भी अन्य समाजशास्त्रियों के समान सामाजिक परिवर्तनों के तीन कारक माने- 1.प्रौद्योगिकी (Technological), 2.जैविक (biological) एवं 3.सांस्कृतिक (Social Factor) कारक |
भारतीय समाजशास्त्रीके.एल शर्मा के अनुसार “सामाजिक संघर्ष और परिवर्तनों का कोई एक कारक नहीं है ....” 1.जनांकिकीय, 2.प्रौद्योगिकीय, 3.आर्थिक , 4.सांस्कृतिक , 5.क़ानूनी और प्रशासनिक, 6.राजनैतिक आदि इसके कारक है|   
उपरोक्त परिभाषाओं के अलावा भी सामाजिक परिवर्तनों के कई रूप आज हमारे समक्ष उभर कर आये है, जिनमें से कुछ इस प्रकार है-
·भौगोलिक  कारक (Geographic Factor)
·भौतिक पर्यावरण कारक (Physical Environment Factor )
·जनसंख्या जनसांखियकीय कारक (Population Demographic Factor)
·युद्ध (War)
·मनोवैज्ञनिक व सामाजिक कारक (Psychological , Sociological Factor)
·प्रौद्योगिकीय कारक (Technological Factor)
·वैचारिक कारक (Ideological Factor)
·आर्थिक कारक (Economic Factor)
·जैविक कारक (Biological Factor)
·राजनैतिक कारक(Political Factor)
·औद्योगिक कारक (Industrial Factor)
·सामाजिक और सांस्कृतिक कारक (Social And Culture Factor)
·वैज्ञानिक प्रौधोगिक अविष्कार और खोज (Scientific Technological Inventions and Discoveries)
·मास कम्युनिकेशन कारक (Mass Communication Factor)
    जब हम सामाजिक परिवर्तन और उसमें युवा वर्ग की बात करते है तो इनकी भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता| आज का युवा जहाँ एक और सामाजिक परिवर्तनों से मिले आविष्कारो में खोया हुआ है तो वहीं आज का ही युवा इन परिवर्तनों का विरोधी भी है| क्योंकि वह इन परिवर्तनों के सभी पहलुओं को परखने की  दृष्टि  रखता है|   
21वी सदी युवाओं की है| भारत के संदर्भ में बात करे तो यहाँ 50 करोड़ से ज्यादा युवा है| इसी कारण आज जब युवा वर्ग की बात की जाती है तो हम घबरा जाते है| यह घबराहट आने वाले भविष्य की है क्योकि भविष्य युवाओं का है और हम ये भी जानते है की युवा समाज से प्रभावित है| ये प्रभाव कितना समस्यामूलक है और कितना कल्याणकारी ये तो भविष्य ही बतायेगा|
     व्यक्ति से समाज बनता है परिस्थितियों से व्यक्ति| परिस्थितियाँ समाजगत है| समाज में आये परिवर्तनों से ही परिस्थितियों का निर्माण होता है| यही परिस्थितियाँ एक व्यक्ति को वैज्ञानिक तो दूसरे को आतंकवादी बनने को मजबूर करती है| फिर क्यों नही कहाँ जा सकता कि समाज व्यक्ति का निर्माण करता है| उसे मानसिक रूप से परिपक्व बनाता है|
    व्यक्ति समाज द्वारा निर्मित प्रक्रिया का ही रूप है| उसका निर्माण समाज द्वारा होता है| हम सभी इस बात से भली-भांति अवगत है कि बालक जन्म के समय शारीरिक ढाँचा मात्र होता है| वह समाज व समाजगत अवधारणाओं से अनजान होता है| वह समाज में रहकर अपने परिवार, संबंधियो, पडोसियों व मित्रों से सीखता है| उसका स्वयं का ज्ञान शून्य होता है उसे समाज ही निर्मित करता है| ऐसे में हम यह कह सकते है कि युवा वर्ग कि निर्मिति का आधार समाज है| 
   युवा समाज का वह वर्ग है जो समाज को बदलने का हौसला रखता है| जो सामजिक परिवर्तनों से स्वयं को प्रभावित भी पाता है साथ उसे बदलने की  इच्छा भी रखता है| अब प्रश्न उठता है कि समाज में युवा किसे कहाँ जाये? सामान्यतः युवा किशोरावस्था और वयस्कता के बीच के समय को कहाँ जा सकता है| विज्ञान में जिसे किशोरावस्था (adolescent stage) कहाँ जाता है अर्थात ‘Youth is alternatives word to the scientifically oriented adolescent and the common term of tean  and teenagers’ या राष्ट्र के निर्माण में वोट डालने के अधिकारिक समय को| रोबर्ट केन्नेडी’(Robert Kennedy)  के शब्दों में कहाँ जाए  “The world demands the qualities of youth not a time of life but state of mind, a temper of will, a quality of imagination, a predominance of courage over timidity of the appetite of adventure over the life case ”| दोनों परिभाषाओं के आधार पर ‘युवा’ को जाना जा सकता है| जैविक स्तर पर इसकी सीमा शारीरिक आधार पर मापी गयी है तो सामाजिक स्तर पर मानसिक आधार पर| युवा उस वर्ग समूह को भी माना गया है जो अपनी सोच व क्रियाओं  से भविष्य को प्रभावित कर सकता है| जैसे कि ‘Youth Actions and Proposals for social Change’ के अंतर्गत युवा के संदर्भ में कहाँ गया कि : “Think Global, act local’ young people have the ability to affect change within their own communities and societies and, in doing so, will also influence and shape events and issues at global level, which they may not even have considered to be within their powers”   
    ‘युवा’ जैविक व मानसिक आधार पर निर्मित उस वर्ग को कहाँ जा सकता है जो समाज में बदलाव चाहता है अथवा जिसमें बदलाव लाने की शक्ति है| आज जब हम सामाजिक परिवर्तनों और युवा वर्ग की बात करते है तो चिंतित व परेशान नजर आते है की युवा दिशाहीन हो गया है| अपनी जिम्मेदारियों से मुकरता जा रहा है| यह दिशाहीनता, नैतिकता का हास उसे विरासत में मिला है| उसने खुदबखुद इसे नहीं कमाया है| यह सामाजिक परिवर्तनों की ही देंन है|
   सामजिक परिवर्तनों ने जहाँ  एक और युवाओं को सुविधाओं दी| उन्हें बेहतर जिंदगी जीने के तरीके सिखाए| मीडिया और संचार क्रांति के स्तर पर विश्व को ग्राम (Global Villageके रूप में तब्दील किया| वहीं सामाजिक स्तर पर चली आ रही कुप्रथाओं जैसे सती प्रथा, बाल विवाह आदि को प्रतिबंधित कर कानून के तहत दंड का प्रावधान दिया| शैक्षिक स्तर पर शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया| जिसके लिए The Right to children Free and Compulsory Education act’ बनाया गया|
  सामाजिक परिवर्तनों का यह केवल एक पक्ष है| इन परिवर्तनों का एक दूसरा पक्ष भी उबरता है| समाज में नैतिक मूल्यों के हास की बात करते है तो संचार मीडिया विशेषतः सिनेमा की भूमिका को नजरंदाज  नहीं किया जा सकता |सिनेमा आज जिस तरह से विचार  को प्रस्तुत कर रहा है उसका प्रभाव मानसिक रूप से बीमार (असंतुलित) युवा वर्ग के रूप में हमारे सामने आ रहा है|
   आज का युवा समाज की तेज रफ्तार जिंदगी में (fast life) खुद को adjust करने की जद्दोजहत में लगा हुआ है| वह कहीं ना कहीं खुद को तलाशता भी नजर आता है| तो दूसरी तरफ यही युवा ‘मै जिंदगी को धुएं की तरह उड़ाता चला गया’ का गीत गा रहा है| कारण विकल्पों का अभाव| बेरोजगारी,आर्थिक अव्यवस्था, राजनैतिक अव्यवस्था, बढ़ता भ्रष्टाचार,न्यायिक देरी, लोकतन्त्र का गिरता स्तर| युवाओं को भीतर तक निराश भी करता है और सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर उन्हें ऐसा समाज क्यों दिया गया? और यदि परिवर्तन किया भी तो आम व्यक्ति का हित कहाँ गया? तमाम प्रश्नों से लेस है आज का युवा वर्ग| उत्तर चाहता है पर उतर ना मिलने पर वह विरोध करता है| जंतर-मंतर व  इंडिया गेट पर कैंडल मार्च और रैली इसी विरोध का एक रूप है| कुछ समय तक शांति पूर्व ढंग से अपने प्रश्नों का उत्तर चाहता है| जब उसे महसूस होता है की  उसकी सुनने वाला कोई नहीं तो वह क्रांति का रुख अख्तियार करता है और विद्रोही के रूप में समाज के समक्ष उभरता है| यह ‘असंतोष’ ही उसे इस प्रकार का व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है| विद्रोही और नक्सली इसी समाज की देन है और ‘असंतोष’ उसका सबसे बड़ा कारण| जो युवाओं में सर्वाधिक देखने को मिलता है|
शिक्षा किसी भी राष्ट्र के निर्माण की बुनियादी शर्त है या कहाँ जा सकता है की  उसका आधार स्तंभ है| हमारे समाज ने विकास के तौफे के रूप में हमे ‘मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया’| जो एक दृष्टि  से तो राष्ट्र हित में है| वहीं इसके दूसरे पक्ष को देखा जाये तो इसके माध्यम से शिक्षा को आधार बनाकर युवाओं को कमजोर किया जा रहा है| विश्व बैंक द्वारा भारतीय बच्चों की शिक्षा का खर्च स्वयं वहन करना| जहाँ देश और समाज को जताता है की विश्व कितना फिकरमंद है हमारे युवाओं के प्रति| वहीं हम क्यों इसके दूसरे पक्ष को देखकर भी नहीं देख पा रहे है| क्या देश मुफ्त शिक्षा के प्रावधान के अन्तर्गत शिक्षा की गुणवक्ता दे पा रहा है या अमेरिकी माँडल को हुबहू अपनाना ही शिक्षा से दायित्व से मुक्ति पाना है| हम सभी शिक्षा के बुनियादी स्तर से परिचित है| आज शिक्षा का उद्देश्य युवाओं को शिक्षित ना कर के मात्र डिग्री धारी बनाना रह गया है| जो भविष्य में युवाओं के देश कहे जाने वाले भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है जो पढ़ा लिखा अशिक्षित युवाओं का देश बनने जा रहा है अगर स्थितियों में बदलाव नहीं आया तो| हम क्यों महज कागजो में शिक्षितों की संख्या का इजाफा करना चाहते है| क्या महज कागजी रूप से शिक्षित हो जाने भर से देश विकास कर सकेगा| क्या महज कागजी शिक्षा युवाओं को उनका सुनहरा भविष्य दे पायेगी| या उन्हें भविष्य के प्रति आशंकित और भयभीत होकर भटकने पर मजबूर करे देगी| ये सवाल आज हम सभी के समक्ष उभर कर आता है की किस तरह से युवाओं को उनका भविष्य दिया जाये|
    युवा समाज बनाता है और समाज युवा को | दोनों गाड़ी के दो पहिये है| यदि एक भी कमजोर पड़ता है या  दोनों में सामंजस्य नहीं होता है| तो गाड़ी भी सामान गति से आगे नहीं बढ़ सकती है| राष्ट्र भी तभी विकास कर सकता है जब व्यक्ति,परिवार और उनसे निर्मित समाज विकास करेगा| और समाज तभी  आगे बढेगा जब युवा बढेगा | 












 









Sunday, January 27, 2013

सामाजिक परिवर्तन और युवा वर्ग


परिवर्तन प्रकृति का नियम है |{ CHANGE IS THE LAW OF NATURE} किसी भी समाज में परिवर्तन उस की जीवंतता का प्रमाण होता है |जो समाज परिवर्तन शील नही होगा उसे मृत और जड़ समाज कहा जायेगा|इसलिए गतिशील और जीवंत समाज में परिवर्तन एक प्रक्रिया है जो निरंतर गतिमान रहती है  | किसी भी समाज में परिवर्तन उसके बाह्य और आंतरिक दोनों रूपों में होता है |यह परिवर्तन लक्षित होता है  जब “किसी युग के आदर्श  तथा मूल्य में यदि पिछले युग के मुकाबले कुछ नयापन या परिवर्तन दिखाई पड़े तो उसे आतंरिक परिवर्तन कहेंगे और यदि किसी सामाजिक अंग यथा–विवाह, परिवार,वर्ग,नातेदारी,जातीय संस्तरण,समूहों के स्वरूपों में परिवर्तन दिखाई देता है तो उसे संरचनात्मक परिवर्तन या बाह्य परिवर्तन कहेंगे” | लेकिन किसी भी समाज के  बाह्य और आंतरिक परिवर्तन में जो सबसे महत्व पूर्ण सवाल उभरता है, वह है परिवर्तन की गति और  दिशा | सामजिक  परिवर्तन की  गति  और दिशा ही किसी भी समाज को आकार देते है |विलियम जोन्स ने सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा देते हुए कहा है कि “सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है जोकि सामाजिक प्रक्रियाओं ,सामाजिक प्रतिमानों ,सामाजिक अंतर्क्रियाओं या सामाजिक संगठन के किसी पहलू में होने वाली भिन्नताओं अथवा परिवर्तनों  के लिए इस्तेमाल किया जाता है |” के.एल. शर्मा का मानना है कि “स्थान ,समय और सन्दर्भ के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक संरचना के अन्दर होने वाले परिवर्तन की प्रक्रियाओं के पुंज को सामाजिक परिवर्तन कहते है” | वही शर्मा आगे अपनी बात की पुष्टि करते हुए कहते है कि “सामाजिक परिवर्तन के व्यापक अध्ययन के लिए संसाधनों,वितरणय प्रक्रियाओं,संस्थात्मक उपायों,शैक्षणिक व्यवस्था,भूमि संबंध,वेतन और जीवन स्तर की प्रकृति आदि को समय,लोग और सन्दर्भ  की दृष्टि में रखना आवश्यक है”|
वास्तव में सामाजिक परिवर्तन का मतलब है किसी भी समाज के ढांचे में  भिन्न-भिन्न कारणों से होने वाले परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप मनुष्य और समाज के संबंधों में आये परिवर्तनों से ,ये परिवर्तन सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में हो सकते है और पहले की स्थितियों  की अपेक्षा जटिल और सरल भी जैसे २१वीं सदी के सामाजिक परिवर्तनों ने पहले की अपेक्षा मनुष्य का जीवन ज्यादा जटिल बना दिया है और मनुष्य का  समाज के  साथ रिश्ता भी कमजोर कर दिया  | इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन का मूल  मनुष्य तथा सामाज के अंतरसंबंध है | इस अंतरसंबंध को समझने के लिए आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक,इतिहास ,जाति ,धर्म ,राजनीति ,शिक्षा ,कानून ,भारतीय मानसिकता ,आदि के चरित्र में हो रहे बदलावों को समझना पड़ेगा | बिना इन्हें समझे हम भारत और विश्व के सामाज में होने वाले परिवर्तनों को नही समझ पायेगें क्योंकि परिवर्तन के ये महत्व पूर्ण घटक है | एम.एन.श्रीनिवास अपनी पुस्तक “आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन” में परिवर्तन की दो अवधारणाओं की चर्चा करते है जिनमे एक है पश्चिमीकरण और दूसरा है संस्कृतीकरण |  पश्चिमीकरण को जहाँ व अंग्रेजों  के प्रभाव के द्वारा हुए परिवर्तनों के संदर्भो में देखते है तो वही संस्कृतीकरण को हिन्दू जाति के सन्दर्भ में इसलिए वो कहते है कि “संस्कृतीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई “नीच” हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह ,किसी उच्च और प्रायः “द्विज” जाति की दिशा में अपने रीति –रिवाज,कर्मकांड ,विचारधारा और जीवन पद्धति को बदलता है”| साथ ही श्रीनिवास इस परिवर्तन के पीछे के कारणों की गहरी पड़ताल करते है | इस प्रकार परिवर्तन शब्द जितना सरल लगता है उतना है नहीं |भारतीय सामाज में परिवर्तन के कई बिंदु है वैदिक काल से लेकर मुग़ल काल तक और फिर अंग्रेजो का आगमन, ये कुछ ऐसे बिंदु है जिनके माध्यम से हम भारतीय समाज में  हुए बड़े  परिवर्तनों  को जान सकते है  | स्वाधीनता प्राप्ति के बाद  भारतीय समाज में आंतरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर कई परिवर्तन देखने को मिलते है ||
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारत में सामाजिक परिवर्तनों का दौर चल पड़ा मनुष्य के आचार व्यवहार से लेकर जीवन पद्धति तक | पंचवर्षीय योजनाओ से लेकर नेहरु के समाजवाद तक  ने स्वाधीन भारतीयों को सुनहरे भविष्य के सपने दिखए   लेकिन १९६० तक आते-आते ये सपने धूमिल पड़ने लगे और चीन के साथ  युद्ध में मिली करारी हार ने तो इन  सपनो  को चकना चूर कर दिया  | नेहरु का यूटोपिया ध्वस्त होने लगा समाज में निराश और मोहभंग छाने लगा,सामंती ताकते फिर से उभार पाने लगी राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रो में इसका प्रभाव पड़ने लगा  | शोषण  और दमन की प्रक्रिया अंग्रेजों  से भी तीव्र  हो गई  जिससे आम आदमी का जीवनयापन बहुत  ही  दुःखदायी हो गया | इस स्थिति का परिणाम हमे नक्सलवादी आन्दोलन के उभार के रूप में दिखाई देता है | इसके बाद पाकिस्तान के साथ दो  युद्ध, इमरजेंसी, राजनीति में एक नई पार्टी का उदय , संचार क्रांति ,नई आर्थिक नीति या उदारीकरण और वैश्वीकरण की बयार से लेकर  ग्लोबल विलेज की अवधारणा व बाबरी विध्वंस आदि तक  स्वाधीन भारत के  कुछ ऐसे बिंदु है जिन्होंने समाज के सभी तबको को प्रभावित किया और समाज में  परिवर्तन भी |  दरअसल ये पूरी कहानी है २०वी सदी के भारत की  है  लेकिन भारत अब २१ वी शताब्दी  में पहुच चुका है देवदास अब देव –डी में परिवर्तित हो चुका है तो समाज में भी कई परिवर्तन हुए है, यही मेरे अध्ययन का केंद्र बिंदु भी है ,साथ ही इन परिवर्तनों में  युवाओं की भूमिका की तलाश करना भी |लेकिन बिना पूर्वपीठिका के २१वी सदी के परिवर्तन को नही समझा जा सकता है | राजीव गाँधी ने 21वी सदी को युवाओं का युग कहा था इसलिय 21 वी सदी की चुनौतियों और परिवर्तनों को बिना युवाओं को समझे नहीं जाना जा सकता है |
२१वी सदी परिवर्तन की सदी है |सामाजिक रूप से क्रांति का युग है,सिनेमा में मल्टीप्लेक्स का, आर्थिक रूप से उपभोक्तावादी,या अब कहिये एफ.डी.का,सांस्कृतिक रूप से पब संस्कृति का, शैक्षणिक रूप से आई.आई .टी.का,और मीडिया के सन्दर्भ में आभासी दुनिया {सोशल मीडिया }का युग है | २१वी सदी में सबसे ज्यादा समाज में परिवर्तन सूचना तकनीक ने किया है जिसमे सोशल मीडिया और इन्टरनेट की महत्त्व पूर्ण भूमिका है | यह समाज नित्य परिवर्तन गामी है | ऐसा समय चुनौतीपूर्ण तो है ही साथ ही आत्ममंथन का भी |इस नित्य परिवर्तन गामी समाज में  युवाओं की भूमिका की तलाश करना एक महत्त्व पूर्ण कार्य है | भारत के सन्दर्भ में तो यह ज्यादा महत्व पूर्ण है क्योंकि  भारत एक युवा देश है यहाँ सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की है, कुल जनसंख्या का लगभग 60 %| लेकिन परिवर्तन में युवाओं की भूमिका की तलाश करने से पहले यह जान लेना जरुरी होगा की दरअसल युवा कहा किसे जाए  ,क्या ४२ साल के राहुल गांधी युवा है या २२ साल के विराट कोहली या फिर 38 साल के चेतन भगत कौन युवा है  ? युवा होने की क्या शर्त है ? राजनीति में युवा की परिभाषा अलग और खेल तथा आम आदमी के लिए अलग है क्या ? युवा का संबंध शरीर से है या मस्तिष्क से या फिर विचारों से ? आखिर कौन युवा है ? किसे कहा जाए  युवा ? ये कुछ विचारणीय प्रश्न है जिनके आलोक मे हमें ,युवाओं  के संदर्भ मे भारतीय और पश्चिमी विचारो को जानना आवश्यक है | युवाओं की पहचान और परिभाषा अलग-अलग संस्कृतियों  मे अलग अलग रही है |भारतीय परंपरा में आश्रमों का वर्गीकरण 25  वर्ष तक ब्रह्मचर्य आश्रम ,25 से 50 तक ग्रहस्थ आश्रम ,50 से 75 तक वानप्रस्थ आश्रम और 75 से 100 वर्ष तक संन्यास आश्रम माना गया है | वही 21वी सदी के भारत ने युवा की नई परिभाषा दी भारत में जब २००३ में राष्ट्रीय युवा नीति का निर्माण हुआ था ,उस समय युवाओं के लिए १३से ३५ वर्ष आयु समूह को युवा की श्रेणी में रखा गया था |  राष्ट्रीय युवा नीति के अंतर्गत ही राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं को दो समान समूहों के अंतर्गत विभाजित करते हुए  १३ से १९ वर्ष के लिए  किशोर { जिसे टीन एजर्स कहा जाता है }|आयु समूह तथा २० से ३५ वर्ष के आयु समूह के लिए मध्यम युवा वर्ग में वर्गीकृत किया गया है | वही पश्चिमी परंपरा में 13 से 19 वर्ष के व्यक्ति को अल्प आयु {टीन एजर्स }माना जाता है |20 से40 वर्ष के व्यक्ति को युवा माना जाता है 40 से 60 अधेड़ ओर 60 के बाद बुजुर्ग माना जाता है | कुल मिलाकर देखा जाय तो  विभिन्न राष्ट्रों ने युवों के लिए २०  से 40  तक का आयु समूह तय किया है |
किसी भी देश की पूंजी मानव संसाधन होता है और उसमे भी उस देश की बुनियाद युवा होते  है | युवा किसी भी देश का आधार होते है क्योंकि सबसे ज्यादा ऊर्जावान और संभावनाए युवाओं मे ही होती है| भारत एक युवा देश है वैश्विक आकड़े बताते है कि जहाँ  २०२० तक अमरीका की औसत आयु ४५ वर्ष चीन की ३७ वर्ष पश्चिमी यूरोप और जापान की ४८ वर्ष होगी ,वही भारत में औसत आयु २९ वर्ष होगी |निश्चित ही सम्पूर्ण विश्व की दृष्टि आज भारत के कौशल युक्त युवाओं पर टिकी है |कहने की आवश्यकता नही है की युवाओं के आधार पर ही भारत ने अपनी परंपरागत छवि का आवरण उतार कर नई पहचान बनाई है | देश से लेकर वैश्विक स्तर पर होने वाले सामाजिक परिवर्तन मे युवाओं की महत्व पूर्ण भूमिका है | आर्थिक सुधरों से लेकर राजनीति, खेल, और व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलनों सब मे युवाओं की महत्व पूर्ण भूमिका है | जिसका जीता जागता उदाहरण है अरब देशों में हुये व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन ,अमरीका मे वल स्ट्रीट आंदोलन और भारत मे हुए जे. पी.आंदोलन से लेकर 21वी सदी मे हुये अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन,और दामनी के साथ हुये अमानवीय व्यवहार के खिलाफ उमड़े आक्रोश के रूप में | दरअसल आज का  युवा संक्रमण के दौर से गुजर रहा है | सत्ता द्वारा ऐसा परिवेश निर्मित किया गया है जिसमे आज का युवा बुरी तरह फंसा हुआ है | गला काट प्रतियोगिता से लेकर बाजारी अर्थव्यवस्था तक |
युवा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का इंजन होता है और सबसे ज्यादा प्रतिभावान  और ऊर्जावान भी युवा ही होते है | लेकिन प्रश्न है आज उस प्रतिभा और ऊर्जा को सही दिशा में इस्तेमाल करने का |आज बाजार युवाओं को लुभावने सपने दिखाकर अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रहा है | मीडिया और सिनेमा बाजार के दो महत्व पूर्ण घटक है जो बाजार के पक्ष में माहौल तैयार करते है | जिसका परिणाम यहा है की आज के  युवाओं का रुझान फौज से ज्यादा एम. एन. सी.{multinational company } की तरफ है |  जिसके फलस्वरूप नैशनेल्टी जैसा मूल्य टुकड़ो मे विभाजित हो गया| इन सबके लिए सिर्फ युवाओं को दोष देना ठीक नही है दरअसल ये पूरा मसला सत्ता के बैस स्ट्रक्चर का है और नीतियों का है  |आज दुनिया के टॉप 100 विश्वविद्यालयों में भारत का कोई भी विश्वविद्यालय नहीं है आखिर क्यों ? आज दुनिया मे सबसे ज्यादा बेरोजगार युवा भारत में है | “जिनमें शहरी भारत में 60% और ग्रामीण भारत में 45% युवा बेरोजगार है” { राष्ट्रीय शहरी रोजगार गारंटी अभियान के अनुसार  }| ऐसी स्थिति में हम किन  युवाओं के बल पर माहाशक्ति बनने जा रहे  है | फिर हम इस परिवर्तन के दौर में युवाओं की भूमिका की सही तलाश कैसे कर पाएगे यह एक बड़ा सवाल है |
युवा किसी भी समाज की रीढ़  होता है| किसी भी देश के विकास और हास में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| आज का युवा भ्रम और यथार्थ के बीच  फंसा हुआ है | यह समय पूंजीवाद के चरम उत्कर्ष का समय है जहाँ आधुनिकता के नाम पर पुराने मूल्यों को ख़ारिज किया  जा रहा है और बाजार हर रोज नये मूल्य तय कर रहा है| पूंजीवादी व्यवस्था का एक मात्र लक्ष्य है लाभ कमाना उसने सम्पूर्ण समाज को आज वस्तु और उपभोक्ता में तब्दील कर दिया है | मनुष्य आज के समाज में एक क्रयशील प्राणी के सिवा कुछ नही रहा | ऐसे कठिन समय में जो आशा कि किरण दिखती है वह युवाओं मे ही क्योंकि आज के युवा के पास इतनी शक्ति और बुद्धि है की वह  समाज के सभी क्षेत्रों मे अपना योगदान दे रहा है  | बस जरूरत है सही दिशा की | गाँधी ने ऐसे ही भयावा समय के लिए  लिखा है कि –“यह सच है कि अपनी योजनाओं  और उन्हें कार्यान्वित करने के तोर तरीकों की असली परीक्षा तब ही होती है जब सामने दिखाई देने वाला  क्षितिज सबसे ज्यादा अंधकारमय हो”| यह वैसा ही अंधकारमय समय है जिसमें युवाओं की असली परीक्षा है | जिसमें राजनीति, समाज, भारतीय मन, सांस्कृतिक, बाजार, आर्थिक नीतियां, सिनेमा, साहित्य और शिक्षा व्यवस्था आदि ऐसे बिंदु है जिनके आलोक  में युवा वर्ग के परिवर्तन गामी स्वरूप को समझा जा सकता है | आज समाज मे युवाओं के नकारात्मक स्वरूप का ही ज्यादा प्रचार है |दरअसल युवाओं पर परंपरा भंजक, मनमौजी पीढ़ी , अनैतिक , क्षण वादी आदि होने का आरोप लगाया जाता रहा है | लेकिन ऐसे आरोपो से पहले हमे  इसके पीछे के सामाजिक और राजनीतिक कारणों के साथ समाज मे हो रहे बदलाओ को जानना होगा तभी हम किसी सार्थक बिन्दु पर पहुँच सकते है  | आज सत्ता के  चरित्र और सामाजिक सरोकारो मे बड़ा परिवर्तन हुआ है | आज लाभ और पूंजी जमा करना ही एकमात्र लक्ष्य है| ऐसे मे सिर्फ युवाओं को दोष देना ठीक  नहीं है ,इसलिए हमें पहले  सत्ता के बेस, नीतियों  और युग की मीमांसा को जानना होगा  तभी किसी सार्थकता पर पहुंचा सकते है |
कुल मिलकर देखा जाय तो सामाजिक परिवर्तन मे युवाओं की भागीदारी को हमें दो स्तरों पर समझना होगा |एक सत्ता के भीतर रहकर परिवर्तन मे भागीदार युवा दूसरा सत्ता के खिलाफ परिवर्तन मे भागीदार युवा |सत्ता के भीतर जो युवा है वो सत्ता की हाथ की कठपुतली बने हुये है उनकी डोर सत्ता के हाथ मे है | वो किसी भी  सरकारी  और गैर सरकारी संस्था मे हों सत्ता के पक्ष में काम करना उनकी  मजबुरी है और जो सत्ता के अंग ही है तो वो तो पूर्ण रूप से सत्ता की नीतियों को अमलीजामा पहना ही रहे है ,ऐसे युवाओं की तादात भी कम नही है | दूसरा जो सत्ता के खिलाफ खड़े होकर परिवर्तन की लौ जलाए है ऐसे युयाओं को हम आजादी की लड़ाई से लेकर जे. पी. आंदोलन और हाल के दोनों में हुई घटनाओं मे भागीदारी के रूप मे देख सकते है | ऐसे युवाओं मे एक धड़ा नक्सलवादी आंदोलन से भी जुड़ा है वो भी परिवर्तन चाहता है | इन सबका गंभीरता से मूल्यांकन करने की जरूरत है क्योंकि  काम न तो सिर्फ कैन्डल मार्च से, न ही युवा दिवस मनाने से होगा काम होगा तो सही नीतियों  और बेहतर व्यवस्था से | क्योंकि  ये समय ब्लैक एंड वाइट का नही बल्कि रंगीन भरा है जहां चीजे साफ दिखने की बजाय धुंदली दिखाई देती है|
{यह आलेख मेरे द्वारा शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय ,छिंदवाड़ा {म. प्र. }के समाजशस्त्र  विभाग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा गया |जिसका कुछ अंश महाविद्यालय द्वारा तैयार की गई पुस्तिका मे भी प्रकाशित हो चुका है |}



संदर्भ सूची -

1.      डां. चंद्रा नरेंद्र,  समाजशास्त्र,  यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन,  संस्करण 2007, नई दिल्ली
2.      वर्मा पवन कुमार{अनु. अभय कुमार दुबे },भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्तान, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 1999, नई दिल्ली
3.      श्रीनिवास एम. एन., आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन, राजकमल प्रकाशन, संस्करण  2011, नई दिल्ली
4.      पटनायक किशन, भारतीय राजनीति पर एक  दृष्टि{गतिरोध ,संभावना और चुनौतियाँ },राजकमल प्रकाशन, संस्करण  2010,  नई दिल्ली
5.      शर्मा के.एल., भारतीय सामाजिक संरचना एंव परिवर्तन, रावत पब्लिकेशन, संस्करण 2010,  नई दिल्ली
6.      शाह घनश्याम{अनु. हरिकृष्ण रावत },भारत में सामाजिक आंदोलन ,रावत पब्लिकेशन, संस्करण 2009,  नई दिल्ली
2         Youth Workshop Draft proposal notebook, Youth Actions and Proposals
for social Change (YOUTH AND CONFLICT RESOLUTION), Alliance for a Responsible, Plural and United World .
                                                                                                                                      
                                                                                                                                               प्रकाश चन्द्र