Sunday, January 27, 2013

सामाजिक परिवर्तन और युवा वर्ग


परिवर्तन प्रकृति का नियम है |{ CHANGE IS THE LAW OF NATURE} किसी भी समाज में परिवर्तन उस की जीवंतता का प्रमाण होता है |जो समाज परिवर्तन शील नही होगा उसे मृत और जड़ समाज कहा जायेगा|इसलिए गतिशील और जीवंत समाज में परिवर्तन एक प्रक्रिया है जो निरंतर गतिमान रहती है  | किसी भी समाज में परिवर्तन उसके बाह्य और आंतरिक दोनों रूपों में होता है |यह परिवर्तन लक्षित होता है  जब “किसी युग के आदर्श  तथा मूल्य में यदि पिछले युग के मुकाबले कुछ नयापन या परिवर्तन दिखाई पड़े तो उसे आतंरिक परिवर्तन कहेंगे और यदि किसी सामाजिक अंग यथा–विवाह, परिवार,वर्ग,नातेदारी,जातीय संस्तरण,समूहों के स्वरूपों में परिवर्तन दिखाई देता है तो उसे संरचनात्मक परिवर्तन या बाह्य परिवर्तन कहेंगे” | लेकिन किसी भी समाज के  बाह्य और आंतरिक परिवर्तन में जो सबसे महत्व पूर्ण सवाल उभरता है, वह है परिवर्तन की गति और  दिशा | सामजिक  परिवर्तन की  गति  और दिशा ही किसी भी समाज को आकार देते है |विलियम जोन्स ने सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा देते हुए कहा है कि “सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है जोकि सामाजिक प्रक्रियाओं ,सामाजिक प्रतिमानों ,सामाजिक अंतर्क्रियाओं या सामाजिक संगठन के किसी पहलू में होने वाली भिन्नताओं अथवा परिवर्तनों  के लिए इस्तेमाल किया जाता है |” के.एल. शर्मा का मानना है कि “स्थान ,समय और सन्दर्भ के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक संरचना के अन्दर होने वाले परिवर्तन की प्रक्रियाओं के पुंज को सामाजिक परिवर्तन कहते है” | वही शर्मा आगे अपनी बात की पुष्टि करते हुए कहते है कि “सामाजिक परिवर्तन के व्यापक अध्ययन के लिए संसाधनों,वितरणय प्रक्रियाओं,संस्थात्मक उपायों,शैक्षणिक व्यवस्था,भूमि संबंध,वेतन और जीवन स्तर की प्रकृति आदि को समय,लोग और सन्दर्भ  की दृष्टि में रखना आवश्यक है”|
वास्तव में सामाजिक परिवर्तन का मतलब है किसी भी समाज के ढांचे में  भिन्न-भिन्न कारणों से होने वाले परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप मनुष्य और समाज के संबंधों में आये परिवर्तनों से ,ये परिवर्तन सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में हो सकते है और पहले की स्थितियों  की अपेक्षा जटिल और सरल भी जैसे २१वीं सदी के सामाजिक परिवर्तनों ने पहले की अपेक्षा मनुष्य का जीवन ज्यादा जटिल बना दिया है और मनुष्य का  समाज के  साथ रिश्ता भी कमजोर कर दिया  | इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन का मूल  मनुष्य तथा सामाज के अंतरसंबंध है | इस अंतरसंबंध को समझने के लिए आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक,इतिहास ,जाति ,धर्म ,राजनीति ,शिक्षा ,कानून ,भारतीय मानसिकता ,आदि के चरित्र में हो रहे बदलावों को समझना पड़ेगा | बिना इन्हें समझे हम भारत और विश्व के सामाज में होने वाले परिवर्तनों को नही समझ पायेगें क्योंकि परिवर्तन के ये महत्व पूर्ण घटक है | एम.एन.श्रीनिवास अपनी पुस्तक “आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन” में परिवर्तन की दो अवधारणाओं की चर्चा करते है जिनमे एक है पश्चिमीकरण और दूसरा है संस्कृतीकरण |  पश्चिमीकरण को जहाँ व अंग्रेजों  के प्रभाव के द्वारा हुए परिवर्तनों के संदर्भो में देखते है तो वही संस्कृतीकरण को हिन्दू जाति के सन्दर्भ में इसलिए वो कहते है कि “संस्कृतीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई “नीच” हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह ,किसी उच्च और प्रायः “द्विज” जाति की दिशा में अपने रीति –रिवाज,कर्मकांड ,विचारधारा और जीवन पद्धति को बदलता है”| साथ ही श्रीनिवास इस परिवर्तन के पीछे के कारणों की गहरी पड़ताल करते है | इस प्रकार परिवर्तन शब्द जितना सरल लगता है उतना है नहीं |भारतीय सामाज में परिवर्तन के कई बिंदु है वैदिक काल से लेकर मुग़ल काल तक और फिर अंग्रेजो का आगमन, ये कुछ ऐसे बिंदु है जिनके माध्यम से हम भारतीय समाज में  हुए बड़े  परिवर्तनों  को जान सकते है  | स्वाधीनता प्राप्ति के बाद  भारतीय समाज में आंतरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर कई परिवर्तन देखने को मिलते है ||
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारत में सामाजिक परिवर्तनों का दौर चल पड़ा मनुष्य के आचार व्यवहार से लेकर जीवन पद्धति तक | पंचवर्षीय योजनाओ से लेकर नेहरु के समाजवाद तक  ने स्वाधीन भारतीयों को सुनहरे भविष्य के सपने दिखए   लेकिन १९६० तक आते-आते ये सपने धूमिल पड़ने लगे और चीन के साथ  युद्ध में मिली करारी हार ने तो इन  सपनो  को चकना चूर कर दिया  | नेहरु का यूटोपिया ध्वस्त होने लगा समाज में निराश और मोहभंग छाने लगा,सामंती ताकते फिर से उभार पाने लगी राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रो में इसका प्रभाव पड़ने लगा  | शोषण  और दमन की प्रक्रिया अंग्रेजों  से भी तीव्र  हो गई  जिससे आम आदमी का जीवनयापन बहुत  ही  दुःखदायी हो गया | इस स्थिति का परिणाम हमे नक्सलवादी आन्दोलन के उभार के रूप में दिखाई देता है | इसके बाद पाकिस्तान के साथ दो  युद्ध, इमरजेंसी, राजनीति में एक नई पार्टी का उदय , संचार क्रांति ,नई आर्थिक नीति या उदारीकरण और वैश्वीकरण की बयार से लेकर  ग्लोबल विलेज की अवधारणा व बाबरी विध्वंस आदि तक  स्वाधीन भारत के  कुछ ऐसे बिंदु है जिन्होंने समाज के सभी तबको को प्रभावित किया और समाज में  परिवर्तन भी |  दरअसल ये पूरी कहानी है २०वी सदी के भारत की  है  लेकिन भारत अब २१ वी शताब्दी  में पहुच चुका है देवदास अब देव –डी में परिवर्तित हो चुका है तो समाज में भी कई परिवर्तन हुए है, यही मेरे अध्ययन का केंद्र बिंदु भी है ,साथ ही इन परिवर्तनों में  युवाओं की भूमिका की तलाश करना भी |लेकिन बिना पूर्वपीठिका के २१वी सदी के परिवर्तन को नही समझा जा सकता है | राजीव गाँधी ने 21वी सदी को युवाओं का युग कहा था इसलिय 21 वी सदी की चुनौतियों और परिवर्तनों को बिना युवाओं को समझे नहीं जाना जा सकता है |
२१वी सदी परिवर्तन की सदी है |सामाजिक रूप से क्रांति का युग है,सिनेमा में मल्टीप्लेक्स का, आर्थिक रूप से उपभोक्तावादी,या अब कहिये एफ.डी.का,सांस्कृतिक रूप से पब संस्कृति का, शैक्षणिक रूप से आई.आई .टी.का,और मीडिया के सन्दर्भ में आभासी दुनिया {सोशल मीडिया }का युग है | २१वी सदी में सबसे ज्यादा समाज में परिवर्तन सूचना तकनीक ने किया है जिसमे सोशल मीडिया और इन्टरनेट की महत्त्व पूर्ण भूमिका है | यह समाज नित्य परिवर्तन गामी है | ऐसा समय चुनौतीपूर्ण तो है ही साथ ही आत्ममंथन का भी |इस नित्य परिवर्तन गामी समाज में  युवाओं की भूमिका की तलाश करना एक महत्त्व पूर्ण कार्य है | भारत के सन्दर्भ में तो यह ज्यादा महत्व पूर्ण है क्योंकि  भारत एक युवा देश है यहाँ सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की है, कुल जनसंख्या का लगभग 60 %| लेकिन परिवर्तन में युवाओं की भूमिका की तलाश करने से पहले यह जान लेना जरुरी होगा की दरअसल युवा कहा किसे जाए  ,क्या ४२ साल के राहुल गांधी युवा है या २२ साल के विराट कोहली या फिर 38 साल के चेतन भगत कौन युवा है  ? युवा होने की क्या शर्त है ? राजनीति में युवा की परिभाषा अलग और खेल तथा आम आदमी के लिए अलग है क्या ? युवा का संबंध शरीर से है या मस्तिष्क से या फिर विचारों से ? आखिर कौन युवा है ? किसे कहा जाए  युवा ? ये कुछ विचारणीय प्रश्न है जिनके आलोक मे हमें ,युवाओं  के संदर्भ मे भारतीय और पश्चिमी विचारो को जानना आवश्यक है | युवाओं की पहचान और परिभाषा अलग-अलग संस्कृतियों  मे अलग अलग रही है |भारतीय परंपरा में आश्रमों का वर्गीकरण 25  वर्ष तक ब्रह्मचर्य आश्रम ,25 से 50 तक ग्रहस्थ आश्रम ,50 से 75 तक वानप्रस्थ आश्रम और 75 से 100 वर्ष तक संन्यास आश्रम माना गया है | वही 21वी सदी के भारत ने युवा की नई परिभाषा दी भारत में जब २००३ में राष्ट्रीय युवा नीति का निर्माण हुआ था ,उस समय युवाओं के लिए १३से ३५ वर्ष आयु समूह को युवा की श्रेणी में रखा गया था |  राष्ट्रीय युवा नीति के अंतर्गत ही राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं को दो समान समूहों के अंतर्गत विभाजित करते हुए  १३ से १९ वर्ष के लिए  किशोर { जिसे टीन एजर्स कहा जाता है }|आयु समूह तथा २० से ३५ वर्ष के आयु समूह के लिए मध्यम युवा वर्ग में वर्गीकृत किया गया है | वही पश्चिमी परंपरा में 13 से 19 वर्ष के व्यक्ति को अल्प आयु {टीन एजर्स }माना जाता है |20 से40 वर्ष के व्यक्ति को युवा माना जाता है 40 से 60 अधेड़ ओर 60 के बाद बुजुर्ग माना जाता है | कुल मिलाकर देखा जाय तो  विभिन्न राष्ट्रों ने युवों के लिए २०  से 40  तक का आयु समूह तय किया है |
किसी भी देश की पूंजी मानव संसाधन होता है और उसमे भी उस देश की बुनियाद युवा होते  है | युवा किसी भी देश का आधार होते है क्योंकि सबसे ज्यादा ऊर्जावान और संभावनाए युवाओं मे ही होती है| भारत एक युवा देश है वैश्विक आकड़े बताते है कि जहाँ  २०२० तक अमरीका की औसत आयु ४५ वर्ष चीन की ३७ वर्ष पश्चिमी यूरोप और जापान की ४८ वर्ष होगी ,वही भारत में औसत आयु २९ वर्ष होगी |निश्चित ही सम्पूर्ण विश्व की दृष्टि आज भारत के कौशल युक्त युवाओं पर टिकी है |कहने की आवश्यकता नही है की युवाओं के आधार पर ही भारत ने अपनी परंपरागत छवि का आवरण उतार कर नई पहचान बनाई है | देश से लेकर वैश्विक स्तर पर होने वाले सामाजिक परिवर्तन मे युवाओं की महत्व पूर्ण भूमिका है | आर्थिक सुधरों से लेकर राजनीति, खेल, और व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलनों सब मे युवाओं की महत्व पूर्ण भूमिका है | जिसका जीता जागता उदाहरण है अरब देशों में हुये व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन ,अमरीका मे वल स्ट्रीट आंदोलन और भारत मे हुए जे. पी.आंदोलन से लेकर 21वी सदी मे हुये अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन,और दामनी के साथ हुये अमानवीय व्यवहार के खिलाफ उमड़े आक्रोश के रूप में | दरअसल आज का  युवा संक्रमण के दौर से गुजर रहा है | सत्ता द्वारा ऐसा परिवेश निर्मित किया गया है जिसमे आज का युवा बुरी तरह फंसा हुआ है | गला काट प्रतियोगिता से लेकर बाजारी अर्थव्यवस्था तक |
युवा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का इंजन होता है और सबसे ज्यादा प्रतिभावान  और ऊर्जावान भी युवा ही होते है | लेकिन प्रश्न है आज उस प्रतिभा और ऊर्जा को सही दिशा में इस्तेमाल करने का |आज बाजार युवाओं को लुभावने सपने दिखाकर अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रहा है | मीडिया और सिनेमा बाजार के दो महत्व पूर्ण घटक है जो बाजार के पक्ष में माहौल तैयार करते है | जिसका परिणाम यहा है की आज के  युवाओं का रुझान फौज से ज्यादा एम. एन. सी.{multinational company } की तरफ है |  जिसके फलस्वरूप नैशनेल्टी जैसा मूल्य टुकड़ो मे विभाजित हो गया| इन सबके लिए सिर्फ युवाओं को दोष देना ठीक नही है दरअसल ये पूरा मसला सत्ता के बैस स्ट्रक्चर का है और नीतियों का है  |आज दुनिया के टॉप 100 विश्वविद्यालयों में भारत का कोई भी विश्वविद्यालय नहीं है आखिर क्यों ? आज दुनिया मे सबसे ज्यादा बेरोजगार युवा भारत में है | “जिनमें शहरी भारत में 60% और ग्रामीण भारत में 45% युवा बेरोजगार है” { राष्ट्रीय शहरी रोजगार गारंटी अभियान के अनुसार  }| ऐसी स्थिति में हम किन  युवाओं के बल पर माहाशक्ति बनने जा रहे  है | फिर हम इस परिवर्तन के दौर में युवाओं की भूमिका की सही तलाश कैसे कर पाएगे यह एक बड़ा सवाल है |
युवा किसी भी समाज की रीढ़  होता है| किसी भी देश के विकास और हास में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| आज का युवा भ्रम और यथार्थ के बीच  फंसा हुआ है | यह समय पूंजीवाद के चरम उत्कर्ष का समय है जहाँ आधुनिकता के नाम पर पुराने मूल्यों को ख़ारिज किया  जा रहा है और बाजार हर रोज नये मूल्य तय कर रहा है| पूंजीवादी व्यवस्था का एक मात्र लक्ष्य है लाभ कमाना उसने सम्पूर्ण समाज को आज वस्तु और उपभोक्ता में तब्दील कर दिया है | मनुष्य आज के समाज में एक क्रयशील प्राणी के सिवा कुछ नही रहा | ऐसे कठिन समय में जो आशा कि किरण दिखती है वह युवाओं मे ही क्योंकि आज के युवा के पास इतनी शक्ति और बुद्धि है की वह  समाज के सभी क्षेत्रों मे अपना योगदान दे रहा है  | बस जरूरत है सही दिशा की | गाँधी ने ऐसे ही भयावा समय के लिए  लिखा है कि –“यह सच है कि अपनी योजनाओं  और उन्हें कार्यान्वित करने के तोर तरीकों की असली परीक्षा तब ही होती है जब सामने दिखाई देने वाला  क्षितिज सबसे ज्यादा अंधकारमय हो”| यह वैसा ही अंधकारमय समय है जिसमें युवाओं की असली परीक्षा है | जिसमें राजनीति, समाज, भारतीय मन, सांस्कृतिक, बाजार, आर्थिक नीतियां, सिनेमा, साहित्य और शिक्षा व्यवस्था आदि ऐसे बिंदु है जिनके आलोक  में युवा वर्ग के परिवर्तन गामी स्वरूप को समझा जा सकता है | आज समाज मे युवाओं के नकारात्मक स्वरूप का ही ज्यादा प्रचार है |दरअसल युवाओं पर परंपरा भंजक, मनमौजी पीढ़ी , अनैतिक , क्षण वादी आदि होने का आरोप लगाया जाता रहा है | लेकिन ऐसे आरोपो से पहले हमे  इसके पीछे के सामाजिक और राजनीतिक कारणों के साथ समाज मे हो रहे बदलाओ को जानना होगा तभी हम किसी सार्थक बिन्दु पर पहुँच सकते है  | आज सत्ता के  चरित्र और सामाजिक सरोकारो मे बड़ा परिवर्तन हुआ है | आज लाभ और पूंजी जमा करना ही एकमात्र लक्ष्य है| ऐसे मे सिर्फ युवाओं को दोष देना ठीक  नहीं है ,इसलिए हमें पहले  सत्ता के बेस, नीतियों  और युग की मीमांसा को जानना होगा  तभी किसी सार्थकता पर पहुंचा सकते है |
कुल मिलकर देखा जाय तो सामाजिक परिवर्तन मे युवाओं की भागीदारी को हमें दो स्तरों पर समझना होगा |एक सत्ता के भीतर रहकर परिवर्तन मे भागीदार युवा दूसरा सत्ता के खिलाफ परिवर्तन मे भागीदार युवा |सत्ता के भीतर जो युवा है वो सत्ता की हाथ की कठपुतली बने हुये है उनकी डोर सत्ता के हाथ मे है | वो किसी भी  सरकारी  और गैर सरकारी संस्था मे हों सत्ता के पक्ष में काम करना उनकी  मजबुरी है और जो सत्ता के अंग ही है तो वो तो पूर्ण रूप से सत्ता की नीतियों को अमलीजामा पहना ही रहे है ,ऐसे युवाओं की तादात भी कम नही है | दूसरा जो सत्ता के खिलाफ खड़े होकर परिवर्तन की लौ जलाए है ऐसे युयाओं को हम आजादी की लड़ाई से लेकर जे. पी. आंदोलन और हाल के दोनों में हुई घटनाओं मे भागीदारी के रूप मे देख सकते है | ऐसे युवाओं मे एक धड़ा नक्सलवादी आंदोलन से भी जुड़ा है वो भी परिवर्तन चाहता है | इन सबका गंभीरता से मूल्यांकन करने की जरूरत है क्योंकि  काम न तो सिर्फ कैन्डल मार्च से, न ही युवा दिवस मनाने से होगा काम होगा तो सही नीतियों  और बेहतर व्यवस्था से | क्योंकि  ये समय ब्लैक एंड वाइट का नही बल्कि रंगीन भरा है जहां चीजे साफ दिखने की बजाय धुंदली दिखाई देती है|
{यह आलेख मेरे द्वारा शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय ,छिंदवाड़ा {म. प्र. }के समाजशस्त्र  विभाग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा गया |जिसका कुछ अंश महाविद्यालय द्वारा तैयार की गई पुस्तिका मे भी प्रकाशित हो चुका है |}



संदर्भ सूची -

1.      डां. चंद्रा नरेंद्र,  समाजशास्त्र,  यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन,  संस्करण 2007, नई दिल्ली
2.      वर्मा पवन कुमार{अनु. अभय कुमार दुबे },भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्तान, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 1999, नई दिल्ली
3.      श्रीनिवास एम. एन., आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन, राजकमल प्रकाशन, संस्करण  2011, नई दिल्ली
4.      पटनायक किशन, भारतीय राजनीति पर एक  दृष्टि{गतिरोध ,संभावना और चुनौतियाँ },राजकमल प्रकाशन, संस्करण  2010,  नई दिल्ली
5.      शर्मा के.एल., भारतीय सामाजिक संरचना एंव परिवर्तन, रावत पब्लिकेशन, संस्करण 2010,  नई दिल्ली
6.      शाह घनश्याम{अनु. हरिकृष्ण रावत },भारत में सामाजिक आंदोलन ,रावत पब्लिकेशन, संस्करण 2009,  नई दिल्ली
2         Youth Workshop Draft proposal notebook, Youth Actions and Proposals
for social Change (YOUTH AND CONFLICT RESOLUTION), Alliance for a Responsible, Plural and United World .
                                                                                                                                      
                                                                                                                                               प्रकाश चन्द्र

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