प्रकाश
१९६० तक आते -आते भारतीय समाज और राजनीति में कई बदलव हुए | गाँधी के ‘ग्राम स्वराज’ व उनके ‘सपनों के भारत’ का कहीं अता-पता नहीं था। गाँधी के सपनों के भारत के साथ ही उनका अंतिम आदमी भी नये भारत में खो गया। जनतंत्र के नाम पर अल्पतंत्र और लुटतंत्र कायम कर दिया गया। आजादी से लोगों की उम्मीदें 1960 के दशक तक चकनाचूर हो गईं। 1960 के दशक की मंदी (1965-67), मजदूरों की बड़े पैमाने पर छंटनी, सूरसा के मुँह की तरह मंहगाई आदि से आम आदमी त्रस्त हो गया । ग्रामीण क्षेत्र में सामंती जुल्म अब भी व्याप्त था आजाद भारत के १५ वर्ष बाद भी सामंती कोड़े किसानों पर बरस रहे थे, छात्र नौजवान बेरोजगारी से जूझ रहे थे,औद्योगिक मजदूर वेतन और मंहगाई भत्ता बढ़ाने के लिए हड़ताल की राह अख्तियार कर रहे थे। गांवों में सामंतों के खिलाफ स्वतः स्फूर्त संघर्ष उमड़ रहा था क्योंकि किसानों के पास इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था । बंगाल में उसी दौर में अनाज के लिए दंगे हुए, बिहार में अकाल ने सैंकड़ों लोगों की लीला समाप्त कर दी। पूरे देश में जनआंदोलनों की बाढ़ सी आ गई। हर जगह लोग अपनी मांगों और अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने लगे। भारत के सभी हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर आये थे। सरकार इसका जवाब लाठी, गोली और जेल से दे रही थी। पुलिस दमन के जरिए छात्रों, मजदूरों व किसानों की आवाजों को दबाने का प्रयास सरकार द्वारा किया जा रहा था। सैकड़ों आन्दोलनकारी पुलिस की गोलियों से मारे जा रहे थे। इन आम लोगों को कांग्रेस सरकार अनाज व रोटी के बदले मौत व गोली दे रही थी।
कमोबेस वैसी है परिस्थितियां हमे २१वी सदी के प्रथम दशक के अंत में देखने को मिली | कांग्रेस का वही चरित्र ,जनता का आक्रोश और नौजवानों का विजय चौक से लेकर इण्डिया गेट तक को घेर लेना आदि | दरसल जनता में आक्रोश का ज्वालामुखी कब से बन रहा था पर इसे चिंगारी दी दामनी के साथ जो अमानवीय घटना हुई उसने | लेकिन १९६० और २०१२ में जो एक समानता है वह है कांग्रेस |
दोस्तों में अब इस लेख के शीर्षक पर आता हूँ , दरसल राजकमल चौधरी की कविता है “मुक्ति प्रसंग” काफी चर्चित कविता है| इस कविता को हिंदी साहित्य पढने वाले हर विद्यार्थी ने पढ़ा होगा| लेकिन इसी कविता में कुछ पंक्तिया है जो १९६० और २०१२ के कई राजनैतिक सामाजिक स्थितियों को एक साथ बयाँ करती ह | दरसल लगता है हम जो १९६० में थे अभी वही तो है क्या बदला करोडपतियो की संख्या , देश का जी.डी.पी .गरीबों की संख्या ,बलत्कार के केस ,भू माफिया , संसद में अपराधियों की संख्या, किसानों की आत्महत्या के केस , बड़े शहरों में इमारतो की मंजिले ,आखिर क्या बदला इन ६५ सालों में जिसे हम वास्तव में बदलाव कहै| यदि किसी को लगता हो कि वास्तव में बदलाव हुआ है तो वे राजकमल की इन पंक्तियों को पढ़े और बदलाव की अवधारणा पर फिर से विचार करे | मेनें कई बार इस कविता को पढ़ा खास करके इन पक्तियों को और समझने की कोशशि की लेकिन पूर्ण रूप से अब तक नही समझ पाया हूँ |वे पंक्तिया है -
इस दुनिया की सबसे नंगी सबसे मजबूत औरत का नाम
है वियतनाम |
उत्तर वियतनाम और दक्षिण वियतनाम
उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया
सफेद अफ्रीका और काला अफ्रीका
पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी
पकिस्तान और हिंदुस्तान
सफेद अमरीका और काला अमरीका
जानसन का अमरीका और एलेन गिन्सबर्ग का
अमरीका
इंदिरा गाँधी का हिन्दुस्तान और मलयराम चौधुरी का हिन्तुस्तान
इस दुनिया की प्रत्येक मजबूत औरत नंगी और दो टुकड़ो में बंटी है
यह औरत मेरी माँ और
मेरी वीवी मेरा देश और मेरी जिंदगी |
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