"हलफनामे"
के बाद "विर्सजन" राजू शर्मा का दूसरा ऐसा उपन्यास
है जो समकालीन यथार्थ को उसकी बारीक और जटिल संरचनाओं में पकड़ने की कोशिश करता है। जहाँ हलफनामें में राजू ने सत्ता की
परिभाषा करते हुए बताया था कि सत्ता मतलब एक विशालकाय हाथी जो कल्पना से भी ज्यादा विशाल हो ,उसकी
लीद से सारा शहर भर जाये, उसकी चाल से धरती डोले, तो विसर्जन में इनकी कोशिश उस विशालकाय प्राणी के भीतर घुसकर उसके
एक-एक तंतूओ की, एक-एक रेशों की पड़ताल
करने जैसा है। यह विसर्जन अपने मूल में अपनी अर्थवत्ता में शब्दों से उसके अर्थ
का विसर्जन है।
यह उपन्यास ऐसे समय
में आया है जबकि हिन्दी साहित्य में भूमंडलीकरण व उसके प्रभावों को लेकर प्रचुर
मात्रा में रचनात्मक व आलोचनात्मक लेखन हो रहा है किन्तु यह लेखन
भू-मंडलीकरण के दृश्यमान प्रभावों, राजनीतिक परिदृश्य, अस्मितागत विमर्शों आदि पर ज्यादा हो रहा है। ‘जल-जंगल-जमीन’, स्त्री, दलित, आदिवासी, नव समाजिक आंदोलनों, मार्क्सवाद के फेल्योर आदि पर हो रहे लेखन को देखकर प्रथम दृष्टया
तो यह लगता है कि हिन्दी के साहित्यकार
भूमंडलीकरण व उससे उत्पन्न खतरों को न सिर्फ पहचान रहे हैं बल्कि उससे मुठभेड़ भी
कर रहे हैं । किन्तु गहराई से इस पूरे रचनात्मक परिदृश्य पर नजर डालने से यह
साफ हो जाता है कि भूमंडलीकरण को लेकर जो पूरा विमर्श हिंदी साहित्य में चल रहा है
वह भूमंडलीकरण के प्रति सिर्फ एक सामान्य छात्रोपयोगी समझ ही विकसित कर पा रहा है। भूमंडलीकरण
का डीकंस्ट्रक्शन’सही
मायनों में हिंदी साहित्य में अभी तक संभव नहीं हो पाया है। दरअसल हिंदी साहित्य
ने जाने अनजाने ही अपनी सुविधानुसार कही न कही भूमंडलीकरण के प्रति अपनी चिंताओं का एक आसान सा वृत्त
तैयार कर लिया है। जिसका केन्द्र भूमंडलीकरण है और स्त्री , दलित’ आदिवासी, बाजार उस केन्द्र के
ईद-गिर्द वृत्त का निर्माण करते हैा जाहिर तौर पर हिन्दी लेखन केंद्र के माध्यम
से इन्हीं कुछ विर्मशों पर गोल-गोल घुम रहा है। हिन्दी साहित्य में
भूमंडलीकरण के मेकेनिज़्म को समझते हुए, उसके भीतर घुसकर उसे
डीकंस्ट्रक्ट करने, सत्ता के साथ उसके
रिश्ते की द्वंद्वात्मकता को समझते हुए उसकी समूची कार्य प्रविधि का अध्ययन
करते हुए नये सत्ता संबंधों को उजागर करने, आर्थिक नीतियों
(अर्थशास्त्र),सांख्यिकी, विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी
आदि को किस तरह वह अपने हक में व्याख्यायित
करता है या कैसे यह चींजें उसे मजबूत करती हैं- को देखने का सार्थक काम हिन्दी
में तकरिबन न के बराबर हुआ हैं। विसर्जन में राजूशर्मा का शुरुआती वाक्य
है-"कुछ लोग होते हैं, एक नज़र देखो और लगता है इसे बादशाहियत हासिल
है, दूसरे उंगलियों में चक्र के यह चक्रवर्ती है, पर यह आँखों में झाँकने के पहले का अहसास है क्योंकि उसकी आँखें दो सयाह गहरी सुरंगे हैं और तब तुम जान लेते हो जो वह
हमेशा से जानता है। यह बादशाह स्वनाशी है, अपना ही निषेध ।"
यह वाक्य अपने समूचे व्याप्ति में भूमंडलीकरण व बाजार की हकीकत को उजागर करता हैा
भूमंडलीकरण, बाजार की चकाचौंध हमें कहीं न कहीं शुरूआत में यह आश्वस्त करती हैं
कि स्वतंत्रता बंधुत्व, बहुलतावाद, अवसर की सामनता जैसी बड़ी अवधारणाये इसमें अन्तर्निहित है किन्तु यह
आभासी व छ्द्म यथार्थ ही है, जैसे ही हम इसकेभीतर
प्रविष्ट होते हैं, इसकी विध्वंसकता व
इसके शोषक व दमनकारी चरित्र को जानते हैं तब स्पष्ट होता है कि इस
चमक-दमक के पीछे एक विद्रूप चेहरा है। उपन्यास के प्रमुख चरित्र रंगराजन के व्यक्तित्व
व कार्यों पर भी पूर्वोक्त पंक्तियाँ काफी सटीक बैठती हैं। वह स्वनाशी है साथ ही
अर्थ विस्तार करें तो सर्वनाशी भी । इतना ही नहीं उपन्यास का यह शुरूआती वाक्य
वर्तमान हिन्दी साहित्य के परिदृश्य पर जो कि भूमंडलीकरण से संबंधित है पर भी
सटीक बैठता है। ऊपर से देखने पर तो यह भू मंडली करण का निषेध (प्रतिरोध) करता दिखता है किन्तु, भीतर घूसकर देखने पर रचनात्मक रिकत्तता ही नजर आती है।
पी.वी. इस उपन्यास का प्रमुख पात्र है। धारावाहिक घोटाले के पीछे का दिमाग पी.बी का ही
है। वह नायक/खलनायक दोनों ही है। उसके फलसफ़े में ‘’निजी
स्वेच्छाचार समाज का केन्द्रिय मूल्य है। उसका मानक-मणि दर्शन कहता है कि व्यक्ति
की स्वतंत्रता स्टेट और उसके दावों से पूर्व और मौलिक है और आजाद माहौल में
सहयोग की दशा खुद-ब-खुद प्रवर्तित होती है। स्टेट के हस्तक्षेप की आवश्यकता
नहीं। वह शास्त्रीय उदारवाद के प्रतिमानों में हर खलल और बदलाव के खिलाफ है ।उसकी
मान्यता है जो उदारवाद को पजिटिव अधिकार , प्रगतिशील कर और कल्याणकारी नीतियों से जोड़ते हैं वे प्रदूषक और खतरे की घंटी
हैं।"
दरअसल पी.बी. रंगराजन
के बौद्धिक सरोकार और उसके राजनीतिक दर्शन, अर्थ-सिद्धान्त के
आस्ट्रियन स्कूल से आधार पाते हैं। वह हायक, नोजिक और मिल्टन फ्रीडमैन जैसे महान विचारकों से अपने सिद्धान्त और
कार्य-योजनाएँ गढ़ता था । खासकर फ्रीड़मैन को वह सबसे अर्थ गर्भित मानता था क्योंकि
बकौल पी.बी. "फ्रीड़मैन ने अंतिम रूप से साबित कर दिया कि असली सामाजिक और
राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए मुक्त बाजार और न्यून स्टैट एकमात्र और सही विकल्प
है।" वस्तुत: पी.वी. मुक्त बाजार का टिमायती होने के साथ-साथ अराजकतावादी
भी है। वह अपने चिंतन में स्टेट को वलफेयर से अलग करता है। व्यक्ति स्वातंत्र्य
का वह हिमायती अराजकता की हद तक है । इसीलिए सर-प्लस के समान वितरण व श्रमिकों के हक के हिमायती महान चिंतक कार्ल-मार्क्स से वह
चिढ़ता है और सार्वजनिक रूप से कहता है कि ‘कौन
मार्क्स ? मैं किसी मार्क्स-फार्क्स
को नहीं जानता।‘ पी.वी. ने 'हमेशा
सामजवादी विचारधारा को खारिज किया । उसकी नजर में समता को अलग से तरजीह देना बैल को हाँकने की जगह उसकी पूँछ में फुलझड़ी लगाने के जैसा है।‘हायक’ 'नोजिक' और 'फ्रीडमैन' जिन्हें वह गांधी जी
के तीन बंदरों की जगह बिठाता है मुक्त-बाजार के परम हिमायती थे । ‘रार्बट
नोजिक एक मिनारकिस्ट था। न्यून सरकार होनी चाहिए । सरकार के बस तीन काम है, जान-माल की सुरक्षा, हिंसा का दमन और निजी करार का प्रवर्तन ।' जबकि हायके ने निजी सम्पत्ति के तत्वों को सभ्यता का जन्म बताया।
उसके अनुसार मुक्त मूल्य प्रणाली इतनी ही मौलिक है जितनी की भाषा की उत्पत्ति।‘’ पी.वी. इन विचारकों से ऊर्जा ग्रहण करता है। वी.पी. के भीतर एक नई
ग्रस्तता भी थी जिसके तहत वह खुद को इक्कीसवी शताब्दी यानी आज का माहत्मा गांधी
समझने लगा था । ‘’वी.पी.के त्वरित दिमाग में गांधी और उसकी अपनी जीवनी में बारीक और
सरासर समानताएँ दिखाई दे रहीं थीं। जिस तरह गांधी अधेड़ उम्र में अचानक दक्षिण
अफ्रीका से लौटा था, पी.वी. अमरीका से खास
समय लौटा है। वहुत जल्न्दी महात्मा ने कांग्रेस पार्टी और देश की जनता पर अपना प्रभुत्व जमा लिया था; पी.वी. ने तमाम संस्थाओं का नेटर्वक तैयार किया है। वह उनका नेतृत्व
कर रहा है और मिडिल क्लास उसका नित्य अभिनंदन कर रही है। महात्मा गांधी
ने चरखा, धोती और खादी को अपने आंदोलन का प्रतीक बनाया; पी.वी. ने योग साधना की कल्ट पैदा की, आर्थिक सुधार ,अभिव्यंजना
और अभिलाषा को खुशहाली का गुरू-मंत्र बनाया और बचत, निवेश और विकास का
सदगुण चक्र। गांधी जी ने आजादी के लिए अहिंसा और सत्याग्रह का अनोखा तरीका ईजाद
किया; पी.वी. ने बाजारवाद और ग्लोबलाइजेशन का एक देशी संस्करण सामने रखा
। महात्मा गांधी ने आत्मत्याग और सरल जीवन का पाठ पढाया था; और पी.वी. ने अनन्त अभिलाषा और लाभ के लिए उधारजनित उपभोग को
दिव्य-बोध की रोशनी दी।‘’और
महात्मा गांधी की तरह पी.वी. के पास न सरकारी पद था, न राजनैतिक गद्दी और न वह इस दौड़ में शामिल था। दरअसल पी.वी. आर. रंगराजन के चरित्र का यह पक्ष और इसको निर्मिता
करने वाले दार्शनिक आर्थिक आधार जो कुछ भी इस उपन्यास में कराते हैं वह भारतीय
स्टेट की उस बिडम्बना को दर्शाता है जो उसने ग्लोबलाइजेशन के चलते गांधी व उनके विचारों के साथ किया है। सिर्फ ग्लोबलाइजेशन के चलते ही क्यू वरन्
आजादी के बाद से ही गांधी व उनके विचारो के साथ भारतीय सरकार का सलूक उपेक्षापरक
ही रहा है ।उपन्यास का ताना-बाना पी.वी. के चरित्र की इन्हीं खासियतों के
ईद-गिर्द बुना गया है। धारावाहिक घोटाले की जांच से शुरू होने वाली उपन्यास
की कथा जांच के बहाने, जांच की प्रक्रिया से
ही आगे बढ़ती है और उसी प्रक्रिया में पी.वी. के चरित्र खासकर उसके द्वारा किये जा
रहे कार्यों से भूमंडलीकरण का रेशा-रेशा हमारे सामने खुलता जाता है। ऐसार, टुप्पुर, भीमसिंह आर्दश दरबारी, प्रोफेसर चन्द्रशेखर आदि के बीच होने वाली बातचीत से ही उपन्यास का
केन्द्रीय विर्मश आगे बढ़ता है। दरअसल, राजू शर्मा के उपन्यासों
की यह खास प्रविधि है कि वह पॉलीमिक्स की थ्यौरी अपनाते हैं । वह स्थितियों का
चित्रण घटनाओं के बजाए बातचीत से करते हैं और इन्हीं बातचीत के माध्यम से
स्थितियाँ, परिस्थितियां पाठकों के सामने खुलती जाती हैं ऐसार और प्रोफेसर चन्द्र शेखर की बातचीत हो ऐसार और पी.वी. की या
पी.वी. का खुद का आत्मालाप सब के सब भूमंडलीकरण के मेकनिज्म को खोलते ही हैं।
उसको डीकास्ट्रक्ट करते हैं ।
बहरहाल ! पी.वी. के
चरित्र की विशेषताएं और खासकर उसके द्वारा अपने आप को इक्कीसवी सदी का गांधी
समझने की ग्रस्तता भूमंडलीकरण, बाजार व वर्तमान
भारतीय-राष्ट्र के अंत:संबंधों के परिदृश्य पर एक
बड़ा विमर्श रचती है, एक नये किस्म के बहस
का स्पेस निर्मित करती हैं । यहीं विमर्श ‘उपन्यास’ के नाम विसर्जन को भी सार्थक करता हैं। वह उसकी अर्थव्याप्ति के
तमाम स्तरों को उजागर भी करता है। दरअसल इस पूरे विमर्श को समझने के लिए हमें
थोड़ा इतिहास में पीछे लौटाना पडे़गा खासकर भारत की आजादी के ठीक बाद के
परिदृश्य तक । भारत में उपनिवेशवाद से पूर्व राज्य का आदमी के जीवन में कोई बहुत
सीधा हस्तक्षेप नहीं था। तब न राष्ट्र की
अवधारणा थी न राष्ट्रवाद की । उन दिनों बाजार भी आज का बाजार नहीं था । वह तुलसी, कबीर, के यहाँ दूसरे
संदर्भों का बाजार था । एक कहावत जो कि तुलसी के मानस के हवाले से लोक में व्याप्त
थी ‘कोई
नृप होये हमें का हानी’, स्टेट और आम आदमी के
रिश्ते को ठीक से व्याख्यायित करती है। किन्तु जब भारत
उपनिवेश बना तब अंग्रेजो ने धीरे-धीरे हमारे मस्तिष्क में स्टेट को बैठाया। स्टेट
की नीतियों का सीधा हस्तक्षेप हमारे
रोज़मर्रा के जीवन में होने लगा ।
चूंकि स्टेट की एक कार्यप्रविधि थी, मशीनरी थी, इसलिए समाज के क्रिया व्यापार, उसके जीवन, रहन-सहन आदि के नियंत्रण में उस मशीनरी का हस्तक्षेप ज्यादा बढ़ना
स्वाभविक था। सबसे बड़ी बिडम्बना घटित हुई आजादी के बाद । वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था
चूंकि अर्थ को केन्द्र में रखती है और वर्तमान आर्थिक जगत व्यक्ति को व्यक्ति
नहीं वरन ऑकड़े में रिडयूस करके देखता है ।
प्रोफेसर महेल्नवीस की अध्यक्षता में भारतीय सांख्यिकी विभाग के गठन के बाद आज
तक भारतीय राष्ट्र की नीतियां आकड़ों से मुक्त नहीं हो पायी हैं। व्यक्ति आज भी
महज एक आंकड़ा है। गरीबी रेखा तय करने का आंकड़ा, मुद्रार्स्फीति ,शेयर-सूचकांक, देश की आर्थिक वृद्धि व उसकी विकास दर आदि के नाम पर परोसे जाने वाले
आंकड़े प्रथमत: और अन्तत: मानवीय गरिमा का हनन ही करते हैं। मानसी के शब्दों का
सहारा लेकर रहा जाय तो सांख्यिकी/ समुच्चयता गैर मानवीय दृष्टिकोण है । गरीबी की
गणना के सम्बन्ध में मानसी द्वारा ऐसार को दिया गया यह तर्क कि ‘’…… हमारे अर्थ जगत में
गरीबी की परिभाषा की जद्दोजहद आज भी जारी है। पचास
साल से ज्यादा हो गये और आज भी हम गरीबी का नाप भोजन की कैलोरी आवश्यकता के आधार
पर करते हैं। मोटा-मोटा यह कि कितना खाने और जिन्दा रहे । मानो इंसान नहीं पशु की
बात कर रहे हैं। ‘’ आंकड़ों के खेल को
अनावृत करता है । स्टेट द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले आंकड़े तेजी से कम होती
गरीबी का मिथ्या यथार्थ सृजित कर रहे हैं। अर्थात-आजादी के बात से जो आंकड़े का
झूठा खेल इस देश में शुरू हुआ था वह आज ज्यादा भयवाह स्थिति में पहुँच गया है।
आंकड़ों की महिमा को
एक अर्थशास्त्री होने के कारण पी.वी. आर. रंगराजन ठीक से समझता था। इसलिए उसने
सांख्यिकी विभाग से आंकड़े चोरी करवाये । वह जानता था कि सूचनाये; आंकडे़ आज के सत्ता
की कुंजी हैं। इनसे वह सरकार गिरा सकता है । पी.वी. का चरित्र जैसा कि मैंने पहले
कहा एक बड़ा विमर्श रचता
है। वह अपनी तुलना गांधी से तो करता है किन्तु गांधी की शब्दावली का इस्तेमाल
करते हुए भी वह गांधी का कुपाठ प्रस्तुत करता है। पी.वी. का चरित्र अपनी पूरी
अन्विति में प्रतिरोधी ज्ञान मीमांसा को उलट देता हैं, उसमे ग्लोबलाइजेशन का संदर्भ और अर्थ भरता है दरअसल दुनिया के
ज्यादातर बड़े दार्शनिक अपने चिंतन में स्टेटलेस सोसायटी की वकालत करते हैं फिर
वह चाहे मार्क्स हों या गांधी । गांधी तो राज्य को गैर जरूरी मानते थे। वह कहते थे कि वैसे तो राज्य होना
ही नहीं चाहिए चीजों का नियोजन इस तरह से हो कि व्यक्ति व समाज का नैतिक उन्नयन
हो जिससे कि राष्ट्र औटोमेटेड हो जाए । अगर राज्य बहुत जरूरी हो या कि
हो भी (गांधी राज्य को अनिवार्य बुराई मानते थे) तो ‘संचार’, विदेश-नीति व रक्षा मामलों तक ही सीमित हो । गांधी के सम्पूर्ण
चिंतन में परस्पर सहभाव, अहिंसा नैतिक उन्नयन(
व्यक्ति व समाज का )पर बल है। उनके केन्द्र में अंतिम आदमी है । उनके स्वराज की
अवधारणा अंत्योदय से पूरी होती है। किन्तु,पी.वी.
अपने फलसफे में गांधी का ठीक उल्टा है। न्यून स्टेट, व्यक्ति स्वतंत्र्य आदि सम्बन्धी उसकी अवधारणा के केन्द्र में
परस्पर सहकार नहीं वरन गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। गांधी के यहाँ व्यक्ति लगातार
परिभाषित है। वह अंतिम आदमी है जिसके पास कुछ भी नहीं है। गांधी उसके उदय / उत्थान/ उन्नति की
बात करते हैं। मार्क्स के यहाँ भी व्यक्ति श्रमिक के रूप में हैं । न ही गांधी
व्यक्ति स्वतंत्र्य के विरोधी थे और न ही मार्क्स । मेनीफेस्टो में साफ-साफ
कहा गया है कि प्रत्येक की सवतंत्रता सबके स्वतंत्रता की अनिवार्य शर्त हैं ।
बावजूद इसके पी.वी. मार्क्स को पसंद नहीं करता क्योंकि एक तो मार्क्स का आर्थिक
चिंतन पी.वी. के उलट है दूसरा बड़ा कारण पी.वी. के व्यक्ति का गांधी व मार्क्स
के व्यक्ति से अलग होना है। पी.वी. का व्यक्ति का ‘अंतिम
आदमी’ या समाज का दबा कुचला गरीब व्यक्ति अथवा श्रमिक नहीं है बल्कि वह है
जो बाजार में पैसा लगा सकता है,उसको
मजबूत करता है, जिसके पास क्रय शक्ति हैं। जाहिर तौर पर वह उच्च वर्ग या कि मध्य-वर्ग
है। मध्य वर्ग आज बाजारा को सबसे ज्यादा मजबूत कर रहा है। इसलिए यह अकारण नहीं है
कि वह पी.वी. कि जय-जय कार करता है, उससे पूजता है। पी॰वी॰ साफ कहता है कि देश के असली सैनिक तो वे लाखों मिलेनिथर लोग हैं जो
डॉलर कमा रहे हैं। वहीं देश की अर्थव्यवस्था
के इंजन हैं।
इस उपन्यास में
पी.पी. का चरित्र एक तरीके से गांधी का ग्लोबल प्रति-संस्करण हैं। जिस तकनीकी का
गांधी जीवन भर विरोध करते रहें उसी तकनीकी की सहायता से पी.वी. ने अगवा ग्रुप बना
करके देश में सरकार के विरोध में एक माहौल कायम किया । उसे सत्ता तक पहुँचने की
कुंजी के रूप में वह इस्तेमाल करता हैं। इतना ही नहीं ‘अहिंसा’ को वह आर्थिक सुधार से जोड़ कर
पर्चे भी लिखता हैं। उसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह ग्लोबलाइजेशन का
प्रतिनिधि चरित्र हैं। उसने पूरी प्रतिरोधी ज्ञान परम्परा की भाषा पर अपना कब्जा
जमा लिया है। अंतिम आदमी की भाषा पर कब्जा करके उसने उन्हें गूंगा बना दिया है, उनकी भाषा उसने छीन ली। इसीलिए
जब पी.वी. बोलता है तब सब उसे सिर्फ सुनते हैं। वह हमेशा वक्ता होता है। दरअसल
पी.वी. ‘सर्वदर्शनग्राही’ है। जिस तरह भूमंडलीकरण गांधी को लेकर चेग्वेरा तक का का इस्तेमाल अपने सामान बेचने के लिए
करता है, या कि लोकतंत्र का छद्म यथार्थ प्रस्तुत करता है । ठीक उसी तरह उसे
पी.वी. भी गांधी, अहिंसा, न्यून स्टेट, व्यक्ति स्वातंत्र
समता ,सबके
उत्थान आदि की बात करता हुआ बाजार, को मजबूत बनाने का काम
करता है। परम्परा , राष्ट्र, आदि जैसी बड़ी
अवधारणाओं का उपयोग वह बाजार व भूमंड़लीकरण के अनुकूल मानस निर्माण करने में करता
है। वह बड़े व महान दार्शिनिकों, समाजसुधारकों की तरह
सवाल उठाता है। वह कहता है ‘अपराधी, अपराध, कानून, न्याय, राज्य,... ऐसी अवधारणाओं को दोहन कर तुम और तुम्हारी सरकार अपना जो वर्चस्व
कायम रखती है, क्या वह इतना ही मूर्त और परम है ? अखंड और अचल ? हर युग का, समय का निश्चित पथ ? क्या ये राष्ट्र और
राज्य के घृणित हथियार नहीं जिनसे वह अपने स्वार्थ और हित की रक्षा करता है।
राज्य का विचार सदा संदिग्ध और धूर्त है और वह निरन्तर धूर्त तरीकों से अपनी
वैद्यता जनमानस पर थोपता है। और में अपराधी हूँ तो राज्य कितना बड़ा अपराधी हुआ ? क्या ताकतवर अपराधी
कम ताकतवर अपराधी को सजा दे, यह न्याय, है।‘’ पी.वी. का यह लहजा
दास्तयत्सकी
के उपन्यास ‘अपराध
और दंड़’ की उस थीम की याद दिलाता है कि इस दुनिया में जिसने भी लीक से हटकर
काम किया प्रथमत: उस समय उसे अपराधी
माना गया। ईसा मसीह, गांधी, गैलिलियों आदि तमाम नाम इसके उदाहरण हैं। इनके साथ स्टेट ने जिस तरह
का बर्ताव किया। उससे पी.वी. की बात सही प्रतीत होती है। वास्तव में पी.वी. तमाम
बड़ी अवधारणाओं को मनुष्यता के हित से हटाकर उनसे उनके मूल अर्थ का विसर्जन कर
बाजार के हित में इस्तेमाल करता है। इस पूरे परिदृश्य पर राजू उपन्यास में बहुत
सटीक टिप्पणी करते हैं। वे लिखते हैं,’’ .... यह भाषा कोई औजार या
संवाहक नहीं, खुद विमर्श है। जो भाषा खुद विमर्श और तर्क हो गई है। वहाँ विर्तक की
भाषा कहाँ से आएगी ........। अर्थात जिस भाषा के या कि जिन अवधारणाओं को इस्तेमाल
कर उपनिवेशवाद या कि शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी गई थी, जिस भाषा का इस्तेमाल अतीत में तमाम विचारकों, राजनीतिज्ञों, चिंतकों ने’ हेजमीनी को तोड़ने में किया था इतिहास की
बिडम्बना से वहीं भाषा खुद शोषण में सहयोग कर रही है। बाजार को स्थापित करने का
एक माध्यम हो गई है। पी.वी. की भाषा से लेकर लडकियों के कूल्हों व वक्ष पर
टी-शर्ट’ जींस पर खुदे क्रांतिकारी नारों, अहिंसा के संदेश, गांधी या चे की तस्वीरों ने उन्हें अर्थहीन बना दिया है। अब वे
महान व्यक्ति व उनके संदेश ‘एक्शन’की जगह ‘फैशन’ बन गये। वर्तमान समय में तो भाषा भी ग्लोबल और निगमित हुई है। कहने
की जरूरत नहीं बची है और न ही प्रतिरोध के प्रतीक। सबसे उनके अर्थ व कान्टेक्सट का विसर्जन हो गया। यह शायद इसी का नतीजा है कि साध्य और साधन की पवित्रता में यकीन रखने वालें गांधी जिन्होंने नैतिक बल
की सहायता से देशहित में ब्रिटिश शासन पर सवाल खड़े किये थे व उन्हें तोड़ा था, उनसे अपनी तुलना करने वाला पी.वी. देश के कानून को निजीकरण के हित
में चुनौती देता है उस पर सवाल खड़े करता है। भारतीय राष्ट्र या कि मनुष्यता के
इतिहास की इस त्रासद बिडम्बना को राजू ने पूरे उपन्यास में विन्यस्त किया है।
‘विसर्जन’ में राजू की बारीक निगाह भारतीय राजनीतिक व समाज में नब्बे के बाद
होने वाले परिवर्तन पर है। वी.एस.एन. एल. व एम.टी.एन.एल. का मसला हो या दूरदर्शन
के निजीकरण का अथवा रियल स्टेट बूम का सब पर राजू की दृष्टि इस उपन्यास में
रही है। जमीन के करोबार की राजनीति, वर्तमान परिदृश्य में
भूमि का मार्केट से जो रिश्ता है और जिसके चलते भूमि सम्बन्धी कानूनों में व्यापक
फेरबदल किये जा रहे हैं। उस पूरे चक्र को इस उपनयास में केन्द्रीयता प्राप्त है
। पी.वी. की महत्वपूर्ण चिन्ता जमीन को सरकार द्वारा अनलाक करा देने को लेकर है
वह जमीन के महत्व को लेकर कुछ
महत्वपूर्ण आलेख भी लिखता है क्योंकि उसका मानना है कि सिर्फ जमीन को अनलॉक कर
दिये जाने से इस देश की तरक्की के तमाम रास्ते खुल सकते हैं। जमीन के पीछे तो इस
देश में वैसे भी लम्बी राजनीति काम करती है। सरकारी उपक्रमों को बेचने के बहाने
कीमती जमीन को कमीशन लेकर,औने-पैने
दामों पर सरकार द्वारा बेचना इस देश में आम है। इसके पीछे के पूरे अर्थशास्त्र को
हमारे समाने खोलते हैं।
उपन्यास में राजू
शर्मा ने भूमंडलीकरण की महत्वपूर्ण कार्य प्रविधि ‘डिस्कसिर्व
प्रेक्टिसेस’ को उजागर किया है, रेखांकित किया है। आज
के समय में यथार्थ का कोई मतलब नहीं रह गया है। वर्चुअल रिआलटी ही आज रिअल हो गयी हैं।
चीजों का अपने Content से विसर्जन हुआ। न्यू
थ्यौरी आँख करेंसी में पूँजी, श्रम से कट गयी है। भाषा, ज्ञान से कट गयी और
ज्ञान अन्य सूचना में रिंड्यूस हो गया है। बड़े संदर्भों में कहें तो उत्पादन
सम्बन्धों में बदलाव के चलते सुपर स्ट्रक्चर अब बेस से अलग होकर स्वतंत्र होने
की प्रक्रिया में हैं, दूसरे शब्दों में कहा
जाये तो स्वतंत्र ही हो गया है। एक आभासी दुनिया हमारे सामने यथार्थ बनकर खड़ी
है। ज्यादा सही यह होगा कि कहा जाये कि भूमंडलीकरण हमारे सामने सर्वप्रथम एक आभासी यथार्थ रचता है और फिर वहीं यथार्थ बनता है| सब कुछ वीडियों गेम की तरह इस कदर सेट किया जाता हैं कि वह बस हो जाये
उसके होने को रोका नहीं जा सकता । इराक युद्ध की तरह पी.वी. भी भारत की अर्थनीति
को बदलने उस पर कब्जे का पूरा प्लान वीडियों गेम की तरह सेट करता है और वह फिर
हो जाता है। आई.वी. की रिर्पोट जो कि थी ही नहीं, ऐसार की तहकीकात जो
उसे दोषी साबित करते थे या फिर सरकार, कोई
उसे नहीं रोक पाता। सरकार तो उसे पदम् विभूषण, भारत रत्न देकर पुरस्कृत
ही करती हैं।
हमारे समय का यथार्थ
अब ब्लैक एंड़ व्हाइट नहीं रह गया है वरन वह धूसर और ग्रे है । इसमें चीजों को
ठीक-ठीक लोकेट कर पाना काफी मुश्किल हो गया है। राजू शर्मा ने इस उपन्यास में
यथार्थ को लोकेट करने की कोशिश की है, आभासी या कि छाया
यथार्थ को अनावृत्त करके। इस उपन्यास को पढ़ने पर लगता है कि राजू शर्मा ने उत्तरआधुनिकता
के तमाम लक्षणों को , उसकी विशेषताओं को औपन्यासिक स्ट्रक्चर में गूंथ कर प्रस्तुत कर
दिया है। ‘विसर्जन’ उत्तरआधुनिक सिद्धान्तों का उसके प्रभावों-दुष्प्रभावों का रचनात्मक
प्रस्तुतिकरण है।
उत्तरआधुनिकता किस तरह
से छ्द्म यथार्थ रचती है वह क्रिब रिर्पोट व उसके सम्बन्ध में की गई उपन्यासकार
की टिप्पणियों से खुलता है। 2050 तक भारत के चीन और अमरीका के बाद सर्वाधिक विकसित देश बनने का दावा करने वाली इस रिर्पोट से जुड़ी
उपन्यासकार की टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है- ‘’पर
शर्त यह है कि इन क्षमताओं की उपलब्धि के लिए आर्थिक सुधार, सही संरचनाएँ, मुक्त बाजार खुलापन
तथा शिक्षा बेहद जरूरी है। एक तरफ से यह चक्रवृद्धि
का कमाल दर्शाता है और सीधी-सीधी भाषा में यह संदेश देता है कि अगर आज तुम गरीब हो
तो कल तुम अमीर होंगे, बशर्ते निर्दिष्ट राह
पर चलो । वही प्राचीन धर्मशास्त्रों का तरीका।‘’
आर्थिक जगत अथवा भूमण्डलीकरण
के क्रूर व आलोकतांत्रिक चेहरे पर प्रोफेसर चन्द्रशेखसर और साफ शब्दों में
प्रकाश डालते हैं, ‘’…. रिर्पोट का पैमाना, उसकी महिमा, उसका चिकना अहंकार, अभीप्सा और निश्चितता उसे घातक बनाती है, बहस की शर्तें निधारित करती है और प्रतिमान की स्पेस निगल लेती है।‘’ अर्थात् विरोध के लिए इस व्यवस्था में कोई स्पेस नहीं रह जाता। सब
कुछ पावर स्ट्रक्चर तय करता है। सारे डिस्कोर्स मार्केट ओरियंटेड पावर स्ट्रक्चर
से जनरेट होते हैं। दरअसल बाजार हमारे सपने पैदा करता है व बेहत्तर भविष्य का ऐसा झूठ गढ़ता है जिस को प्राप्त करने के लिए यदि हम
उसकी कार्य योजना पर अमल करें तो हम ऊपर से नीचे तक एक प्रोडेक्ट में तबदील हो
जायें । गांधी के यहाँ विकास के लिए स्वदेशी स्थानीयता के साथ-साथ स्वावलम्बन
व सहकार अनिवार्य था पर आज की व्यवस्था में पी.वी. जैसे लोगों के अर्थशास्त्र
में स्वदेशी की जगह ग्लोबल व सहकार की जगह शोषण को लाती हैं। राजू शर्मा को स्टेट
की सत्ता-संरचना को डिकान्स्ट्रक्ट करने में महारत हासिल है। ‘हलफनामे’ में जो संरचना वह हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं विसर्जन में वह ज्यादा
नग्न और भयवाह रूप में मौजूद है। स्टेट वस्तुत: एक अमूर्त सरंचना है जो अपनी प्रकृति
में हिंसक हैं। वह अपने अंगों उपायों के माध्यम से अपनी सत्ता व शक्ति का डैमो
करता है। जाहिर तौर पर सत्ता व शक्ति की यह संरचना प्रथमत: भाषा में निर्मित होती
है। इसलिए स्टेट के पावर स्ट्रक्चर को समझने व उसे तोड़ने के लिए
सर्वप्रथम भाषा का डिकांस्ट्रक्शन जरूरी हो जाता है। राजू शर्मा ने विसर्जन में
नामों के माध्यम से इस स्ट्रक्चर को डिकान्स्ट्रक्ट करने का प्रयास किया है , ‘डिब’, ‘आदर्श दरबारी’, पी.वी. आर.आर. रंगराजन (वी.आर.= भारत रत्न) जैसे नाम न सिर्फ स्टेट
की कार्य प्रविधि का मजाक उड़ाते हैं बल्कि उसके पीछे यथार्थ को बया भी करते हैं।
जो आदर्श दरबारी होगा वहीं इस सत्ता व्यवस्था में प्रमुख पद प्राप्त कर सकता
है। आई.बी., की पूरी कार्य प्रविधि कि देश की सर्वाधिक महत्वपूर्ण खुफिया ऐजेंसी
में किस तरह के लोग हैं, और कैसे उसका उपयोग
राजनैतिक फायदे के लिए किया जाता है न कि देश की सुरक्षा हेतु, इस पर विसर्जन विस्तृत बहस करता है। आई.वी. की स्थिति बेहद दर्दनाक
व हास्यस्पद है क्योंकि एसार जैसे ईमानदार अफसर की रिर्पोट का कोई मतलब वहाँ
नहीं है।
भूमण्डलीकरण एक बहुत
ही व्यापक अवधारणा है। इस विश्व में एक साथ कई स्तरों पर उसकी सक्रियता देखने
को मिलती है। हिन्दी में ‘विसर्जन’ ऐसा पहला उपन्यास है जो भूमण्डलीकरण के प्लेयर्स को चिहिृत करता
है साथ ही इसकी नीतिया कहाँ बनती है, कहाँ से दार्शनिक आधार
पाती हैं, इसको लेकर नेगोशिएशन कहाँ-कहाँ हो रहा है
की विस्तृत पडताल करता है। केन्द्रीयता टूटने, विचारधारा के अन्त के
दावों के बीच भूमण्डलीकरण कैसे खुद केन्द्र बन गया है और कैसे वह एक व्यवस्थित
विचारधारा है, राजू इसे परत-दर-परत हमारे सामने उघाड़ते है। वे भूमण्डलीकरण के केन्द्र
को उसके भीतर घुसकर तोड़ने की सार्थक रचनात्मक कोशिश भी करते हैं। चूंकि भूमण्डलीकरण
का पूरा खेल आर्थिक जगत से जुड़ता है, उससे संचालित व
नियंत्रित होता है, इसलिए विसर्जन में
राजू प्रमुखता से आर्थिक जगत व भूमण्डलीकरण के सम्बन्धों को विखण्डित करते
हैं। सर्वप्रथम वह अपने पात्रों के नामों से ही ऐसा करते हैं। चन्द्रशेखर पी.वी.आर.आर. रंगराजन, जैसे नाम आर्थिक जगत
से जुड़े नाम हैं। इनकी गतिविधियों के माध्यम से भूमण्डलीकरण व आर्थिक जगत की
कूट संरचनाओं को राजू डिकोड करते हैं दरअसल हिन्दी साहित्य में अभी आर्थिक
सिद्धान्तो,बाजार व सत्ता के सम्बन्धोंको सैद्धान्तिक स्तर पर समझकर उसे विखण्डित करने वाले
लेखन का ट्रेंड अभी शुरू ही नहीं हुआ है। राजू शर्मा का ‘विसर्जन’इस लिहाज से हिन्दी
में एक नये ट्रेंड की शुरूआत करता है। हिंदी में शोधपरक उपन्यासों की परम्परा
कोई खास समृद्ध नहीं है, जो कुछ शोधपरक उपन्यास
है भी वे किसी व्यक्ति विशेष के जीवन या घटना विशेष से सम्बन्धित हैं। भूमण्डलीकरण
जैसे वैश्विक फेनामिना पर व्यापक शोध व सैद्धान्तिक की गहरी समझ तथा राजनीतिक सत्ता
के अंर्तसम्बन्धों के हरेक पेचोखम को उसके भीतर घुसकर मुकम्मल समझ के
साथ लिखा गया,’विसर्जन’पहला उपन्यास है।
दिल्ली के बारे में जो सूचनायें किताब लिखने की तैयारी के क्रम में ऐसार पाठकों
केा देता है। वह यह दिखाता है कि गम्भीर उपन्यास लेखन अथवा विश्वसनीय सजर्नात्मक
लेखन के लिए कितने शोध व तैयारी तथा मल्टीडाइमेनशनल समझ की जरूरत होती है । गंभीर
उपन्यास सिर्फ चलताऊ जुमलों से नही लिखा जा सकता है। राजू ने भूमण्डलीकरण के केन्द्र
को विखण्डित किया है। उपन्यास में आया दिल्ली का यथार्थ दरअसल राष्ट्र के केन्द्र
के बहाने भूमण्डलीकरण का यथार्थ है। अपनी चमक-दमक के पीछे कितना शातीर बेईमान
क्रूर अमानवीय है यह दिल्ली में रिक्शा चालकों की तदाद, बेघर के आंकड़े से स्पष्ट होता है। दिल्ली का सच सिर्फ भूमण्डलीकरण
का वैश्विक सच है । वह सच्चाई ऐसे बीमार देश व समाज की जहाँ ‘विसर्जन’की अन्तरकथा केाई
रूपक या गल्प नहीं वरन नंगी सच्चाई है।
राजू शर्मा के इस उपन्यास
की कथावस्तु बहुत व्यापक है पर कथा छोटी।
औपन्यासिक प्रविधि के तहत राजू ने डिटेक्टिव फिक्शन प्रविधि का इस्तेमाल कर इस
गरिष्ठ को रोचक व पठनीय बनाय है बाजार
से शुरू हुआ यह उपन्यास अंतिम में बाजार के सच को उजागर करता हुआ खत्म होता है
अर्थात् बाजार राष्ट्र व समाज को बीमार बना रहा है। इसीलिए यह उपन्यास ऐसार, रंगराजन या आदर्श दरबारी की कथा नहीं है उस पूरे समाज की कथा है । एक
ऐसा समाज जहाँ नायक और खलनायक में भेद कर पाना मुश्किल है। रचनात्मक व्यक्तित्व
वाले ऐसार मेहनत और सच्चाई का कोई मूल्य नहीं है। पी.वी. जैसे लोग नायक हैं।
देरिद्रा ने कहा था कि भाषा में बनी बायनरी को उलट देने की जरूरत है मसलन स्त्री-
पुरूष, दिन –रात आदि को। बिडम्बना यह है कि यह अवधारणा भूमण्डलीकरण ने इस तरह इस्तेमाल की
उन वी.पी. जैसे लोगों को न हम निष्कर्ष रूप में बुरा कह सकते है न समाज कहता है।
जो उसकी बेईमानी के सच को चिन्हित करता है उस सच को समाज नहीं मानता। क्योंकि आज
न आप किसी को उस तरह अच्छा कह सकते है और न ही बुरा जैसा कि प्रचलित संदर्भों में समझा जाता था। अब सच का सारा मामला दूरबीन के
एंगल का है। कोई व्याख्या गलत नहीं है। शायद इसीलिए
पी.वी. की व्याख्या गांधी सी दिखती है।
(यह लेख पक्षधर के 13 वे अंक मे छप चुका का है | लेखक की अनुमति से इसे यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है)
लेखक -अरुणेश शुक्ल (सहायक प्रोफेसर म॰ग॰अ॰ हि॰ विश्वविद्यालय, वर्धा)
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