Thursday, January 31, 2013

परिवर्तन रूपी रथ का पहिया है युवा


 भावना 
परिवर्तन सतत चलने वाली क्रिया है| ‘Its the part of life and Art of life यह जीवन का हिस्सा भी है और जीवन जीने की कला भी| परिवर्तन प्रकृति की स्वाभाविक क्रिया भी है और नियम भी| वास्तविकता भी यही है की जीवन गतिशील है| जहाँ गतिहीनता है वहीं मृत्यु है| यदि परिवर्तन के सैदान्तिक पक्ष की बात करें तो यह ‘एक सार्वकालिक घटना है”, जो किसी न किसी रूप में हमेशा घटित होती रहती है और व्यवहारिक रूप में कहा जाये तो प्रकृति ने ही मनुष्य को जीवन दिया है| भले ही मनुष्य ने अपनी उपयोगिता के अनुसार परिवार, समाज, धर्म, राजनीति, न्याय व्यवस्था और नैतिक मूल्य जैसी संस्थाओ का निर्माण किया| समय के साथ समाज और परिवार से जुडी इन इकाइयों के स्वरूपों में भी अंतर आया| यह अंतर आज सामाजिक परिवर्तनों के रूप में भी जाना और समझा जा सकता है| जब हम परिवर्तन की बात करते है तो परिवर्तन का स्वरुप सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक,धार्मिक,नैतिक व भौतिक संबंधो में देखते है| जैसा की सामाजिक परिवर्तन को परिभाषित करते हुए समाजशास्त्रियों का कहना है-
मकीवर एवं पेज’(R.M Maclver and C.H.Page) के अनुसार “समाजशास्त्री के रूप में हमारा प्रत्यक्ष संबंध सामाजिक सम्बन्धों से है| इन सम्बन्धों में जो परिवर्तन आता है मात्र उसी को सामाजिक परिवर्तन कहेगे|”
डेविस’(K.Devis) के अनुसार सामाजिक परिवर्तन “सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न होता है| जिसे समाज की संरचना और प्रकार्य के रूप मे जाना जाता है|”
एच.एम जानसन(H.MJohnson) के अनुसार “सामाजिक परिवर्तनों से अभिप्राय सामाजिक संरचना में परिवर्तनों से है| [
आइ.एम.जिटलिन(I.M Zeitlin) के अनुसार “सामाजिक परिवर्तनों के अध्ययन का संबंध उन प्रक्रियाओ से है जिनके द्वारा समाज और संस्कृति में बदलाव आता है|”
व्यक्ति बदलता है तो समाज स्वतः ही बदलाव की और अग्रसर होता है यह भी कहाँ जा सकता है कि समाज व्यक्ति को बदलने पर मजबूर भी कर देता है| दोनों ही क्रियाएँ स्वाभाविक है| सामाजिक परिवर्तनों का स्वरूप भी कुछ ऐसा ही है| यह एक सामान नहीं होता है| यह दशा और दिशा के अनुरूप स्वयं को अलग–अलग रूपों में हमारे समक्ष रखता है| जैसे
  • सामाजिक परिवर्तन एक ‘विश्वव्यापी प्रक्रिया’(Universal Process) है| यह दुनिया में हर समय घटित होता  है|
  •  यह‘एक रेखीय(Unilinear) तो कभी बहुरेखीय(Multi linear)है| विज्ञान के अन्तर्गत हुए आविष्कारो को एक रेखीय’(Unilinear) के अन्तर्गत रखा जा सकता है|
  •  सामाजिक परिवर्तनों की गति अनियमित तथा सापेक्षित (Irregular and Relative) होती है| अर्थात समाज की  विभिन्न इकाइयों के बीच गति एक समान नहीं होती है|
  •  सामाजिक परिवर्तनों में परिवर्तन की प्रकृति ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जाने की  होती है; जिसे  उतार-चढ़ाव परिवर्तनों (Fluctuating Changes) के नाम से जाना जाता है| उदाहरण के लिए समाज का  आध्यात्म से क्षण के महत्त्व की और बढ़ता झुकाव और हर पल को जीने की बढती चाहत उतार-चढ़ाव परिवर्तनों का ही एक रूप कहाँ जा सकता है|
उपरोक्त सामाजिक परिवर्तनों के स्वरूप पर चर्चा करते हुए “मकीवर एवं पेज”सामाजिक परिवर्तनों के अन्तर्गत एकरेखीय , उतार-चढ़ाव परिवर्तन व तरंगीय परिवर्तन की बात करते है तो “बोंट्मोर” परिवर्तन के स्रोतों ,परिवर्तन होने की पूर्वावस्था, परिवर्तन की गति व परिवर्तन योजनाबद्ध है या आकस्मिक के आधार पर परिवर्तनों की चर्चा करते है| 
सामाजिक परिवर्तनों के कारक (Factor Of Social Change)
सामाजिक परिवर्तनों के अनेक कारक है जो किसी न किसी रूप में समाज को प्रभावित करते आ रहे है| सामाजिक परिवर्तनों के आधार पर ही हम युवा को भी भली-भांति समझ भी सकते है| जिसके संदर्भ में हम आगे चर्चा करेगें| उससे पहले सामाजिक परिवर्तनों के कारकों को समझना अनिवार्य है| समाजशास्त्रियों के आधार पर सामाजिक परिवर्तन –
एच.एम जानसन परिवर्तनों के स्रोतों के आधार पर सामाजिक परिवर्तन को तीन रूपों में बताते है-1.आंतरिक कारक(Internal Factor), 2.बाह्य करक (External Factor), 3. गैर-सामाजिक पर्यावरण (Non Social Movement)|
ऐन्थनी गिडेन्स ने सामाजिक परिवर्तनों के कारकों का उल्लेख करते हुए इसके तीन कारक बताये-1.भौतिक पर्यावरण, 2.राजनीतिक व्यवस्था और 3. संस्कृति |
मकीवर और पेज ने भी अन्य समाजशास्त्रियों के समान सामाजिक परिवर्तनों के तीन कारक माने- 1.प्रौद्योगिकी (Technological), 2.जैविक (biological) एवं 3.सांस्कृतिक (Social Factor) कारक |
भारतीय समाजशास्त्रीके.एल शर्मा के अनुसार “सामाजिक संघर्ष और परिवर्तनों का कोई एक कारक नहीं है ....” 1.जनांकिकीय, 2.प्रौद्योगिकीय, 3.आर्थिक , 4.सांस्कृतिक , 5.क़ानूनी और प्रशासनिक, 6.राजनैतिक आदि इसके कारक है|   
उपरोक्त परिभाषाओं के अलावा भी सामाजिक परिवर्तनों के कई रूप आज हमारे समक्ष उभर कर आये है, जिनमें से कुछ इस प्रकार है-
·भौगोलिक  कारक (Geographic Factor)
·भौतिक पर्यावरण कारक (Physical Environment Factor )
·जनसंख्या जनसांखियकीय कारक (Population Demographic Factor)
·युद्ध (War)
·मनोवैज्ञनिक व सामाजिक कारक (Psychological , Sociological Factor)
·प्रौद्योगिकीय कारक (Technological Factor)
·वैचारिक कारक (Ideological Factor)
·आर्थिक कारक (Economic Factor)
·जैविक कारक (Biological Factor)
·राजनैतिक कारक(Political Factor)
·औद्योगिक कारक (Industrial Factor)
·सामाजिक और सांस्कृतिक कारक (Social And Culture Factor)
·वैज्ञानिक प्रौधोगिक अविष्कार और खोज (Scientific Technological Inventions and Discoveries)
·मास कम्युनिकेशन कारक (Mass Communication Factor)
    जब हम सामाजिक परिवर्तन और उसमें युवा वर्ग की बात करते है तो इनकी भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता| आज का युवा जहाँ एक और सामाजिक परिवर्तनों से मिले आविष्कारो में खोया हुआ है तो वहीं आज का ही युवा इन परिवर्तनों का विरोधी भी है| क्योंकि वह इन परिवर्तनों के सभी पहलुओं को परखने की  दृष्टि  रखता है|   
21वी सदी युवाओं की है| भारत के संदर्भ में बात करे तो यहाँ 50 करोड़ से ज्यादा युवा है| इसी कारण आज जब युवा वर्ग की बात की जाती है तो हम घबरा जाते है| यह घबराहट आने वाले भविष्य की है क्योकि भविष्य युवाओं का है और हम ये भी जानते है की युवा समाज से प्रभावित है| ये प्रभाव कितना समस्यामूलक है और कितना कल्याणकारी ये तो भविष्य ही बतायेगा|
     व्यक्ति से समाज बनता है परिस्थितियों से व्यक्ति| परिस्थितियाँ समाजगत है| समाज में आये परिवर्तनों से ही परिस्थितियों का निर्माण होता है| यही परिस्थितियाँ एक व्यक्ति को वैज्ञानिक तो दूसरे को आतंकवादी बनने को मजबूर करती है| फिर क्यों नही कहाँ जा सकता कि समाज व्यक्ति का निर्माण करता है| उसे मानसिक रूप से परिपक्व बनाता है|
    व्यक्ति समाज द्वारा निर्मित प्रक्रिया का ही रूप है| उसका निर्माण समाज द्वारा होता है| हम सभी इस बात से भली-भांति अवगत है कि बालक जन्म के समय शारीरिक ढाँचा मात्र होता है| वह समाज व समाजगत अवधारणाओं से अनजान होता है| वह समाज में रहकर अपने परिवार, संबंधियो, पडोसियों व मित्रों से सीखता है| उसका स्वयं का ज्ञान शून्य होता है उसे समाज ही निर्मित करता है| ऐसे में हम यह कह सकते है कि युवा वर्ग कि निर्मिति का आधार समाज है| 
   युवा समाज का वह वर्ग है जो समाज को बदलने का हौसला रखता है| जो सामजिक परिवर्तनों से स्वयं को प्रभावित भी पाता है साथ उसे बदलने की  इच्छा भी रखता है| अब प्रश्न उठता है कि समाज में युवा किसे कहाँ जाये? सामान्यतः युवा किशोरावस्था और वयस्कता के बीच के समय को कहाँ जा सकता है| विज्ञान में जिसे किशोरावस्था (adolescent stage) कहाँ जाता है अर्थात ‘Youth is alternatives word to the scientifically oriented adolescent and the common term of tean  and teenagers’ या राष्ट्र के निर्माण में वोट डालने के अधिकारिक समय को| रोबर्ट केन्नेडी’(Robert Kennedy)  के शब्दों में कहाँ जाए  “The world demands the qualities of youth not a time of life but state of mind, a temper of will, a quality of imagination, a predominance of courage over timidity of the appetite of adventure over the life case ”| दोनों परिभाषाओं के आधार पर ‘युवा’ को जाना जा सकता है| जैविक स्तर पर इसकी सीमा शारीरिक आधार पर मापी गयी है तो सामाजिक स्तर पर मानसिक आधार पर| युवा उस वर्ग समूह को भी माना गया है जो अपनी सोच व क्रियाओं  से भविष्य को प्रभावित कर सकता है| जैसे कि ‘Youth Actions and Proposals for social Change’ के अंतर्गत युवा के संदर्भ में कहाँ गया कि : “Think Global, act local’ young people have the ability to affect change within their own communities and societies and, in doing so, will also influence and shape events and issues at global level, which they may not even have considered to be within their powers”   
    ‘युवा’ जैविक व मानसिक आधार पर निर्मित उस वर्ग को कहाँ जा सकता है जो समाज में बदलाव चाहता है अथवा जिसमें बदलाव लाने की शक्ति है| आज जब हम सामाजिक परिवर्तनों और युवा वर्ग की बात करते है तो चिंतित व परेशान नजर आते है की युवा दिशाहीन हो गया है| अपनी जिम्मेदारियों से मुकरता जा रहा है| यह दिशाहीनता, नैतिकता का हास उसे विरासत में मिला है| उसने खुदबखुद इसे नहीं कमाया है| यह सामाजिक परिवर्तनों की ही देंन है|
   सामजिक परिवर्तनों ने जहाँ  एक और युवाओं को सुविधाओं दी| उन्हें बेहतर जिंदगी जीने के तरीके सिखाए| मीडिया और संचार क्रांति के स्तर पर विश्व को ग्राम (Global Villageके रूप में तब्दील किया| वहीं सामाजिक स्तर पर चली आ रही कुप्रथाओं जैसे सती प्रथा, बाल विवाह आदि को प्रतिबंधित कर कानून के तहत दंड का प्रावधान दिया| शैक्षिक स्तर पर शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया| जिसके लिए The Right to children Free and Compulsory Education act’ बनाया गया|
  सामाजिक परिवर्तनों का यह केवल एक पक्ष है| इन परिवर्तनों का एक दूसरा पक्ष भी उबरता है| समाज में नैतिक मूल्यों के हास की बात करते है तो संचार मीडिया विशेषतः सिनेमा की भूमिका को नजरंदाज  नहीं किया जा सकता |सिनेमा आज जिस तरह से विचार  को प्रस्तुत कर रहा है उसका प्रभाव मानसिक रूप से बीमार (असंतुलित) युवा वर्ग के रूप में हमारे सामने आ रहा है|
   आज का युवा समाज की तेज रफ्तार जिंदगी में (fast life) खुद को adjust करने की जद्दोजहत में लगा हुआ है| वह कहीं ना कहीं खुद को तलाशता भी नजर आता है| तो दूसरी तरफ यही युवा ‘मै जिंदगी को धुएं की तरह उड़ाता चला गया’ का गीत गा रहा है| कारण विकल्पों का अभाव| बेरोजगारी,आर्थिक अव्यवस्था, राजनैतिक अव्यवस्था, बढ़ता भ्रष्टाचार,न्यायिक देरी, लोकतन्त्र का गिरता स्तर| युवाओं को भीतर तक निराश भी करता है और सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर उन्हें ऐसा समाज क्यों दिया गया? और यदि परिवर्तन किया भी तो आम व्यक्ति का हित कहाँ गया? तमाम प्रश्नों से लेस है आज का युवा वर्ग| उत्तर चाहता है पर उतर ना मिलने पर वह विरोध करता है| जंतर-मंतर व  इंडिया गेट पर कैंडल मार्च और रैली इसी विरोध का एक रूप है| कुछ समय तक शांति पूर्व ढंग से अपने प्रश्नों का उत्तर चाहता है| जब उसे महसूस होता है की  उसकी सुनने वाला कोई नहीं तो वह क्रांति का रुख अख्तियार करता है और विद्रोही के रूप में समाज के समक्ष उभरता है| यह ‘असंतोष’ ही उसे इस प्रकार का व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है| विद्रोही और नक्सली इसी समाज की देन है और ‘असंतोष’ उसका सबसे बड़ा कारण| जो युवाओं में सर्वाधिक देखने को मिलता है|
शिक्षा किसी भी राष्ट्र के निर्माण की बुनियादी शर्त है या कहाँ जा सकता है की  उसका आधार स्तंभ है| हमारे समाज ने विकास के तौफे के रूप में हमे ‘मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया’| जो एक दृष्टि  से तो राष्ट्र हित में है| वहीं इसके दूसरे पक्ष को देखा जाये तो इसके माध्यम से शिक्षा को आधार बनाकर युवाओं को कमजोर किया जा रहा है| विश्व बैंक द्वारा भारतीय बच्चों की शिक्षा का खर्च स्वयं वहन करना| जहाँ देश और समाज को जताता है की विश्व कितना फिकरमंद है हमारे युवाओं के प्रति| वहीं हम क्यों इसके दूसरे पक्ष को देखकर भी नहीं देख पा रहे है| क्या देश मुफ्त शिक्षा के प्रावधान के अन्तर्गत शिक्षा की गुणवक्ता दे पा रहा है या अमेरिकी माँडल को हुबहू अपनाना ही शिक्षा से दायित्व से मुक्ति पाना है| हम सभी शिक्षा के बुनियादी स्तर से परिचित है| आज शिक्षा का उद्देश्य युवाओं को शिक्षित ना कर के मात्र डिग्री धारी बनाना रह गया है| जो भविष्य में युवाओं के देश कहे जाने वाले भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है जो पढ़ा लिखा अशिक्षित युवाओं का देश बनने जा रहा है अगर स्थितियों में बदलाव नहीं आया तो| हम क्यों महज कागजो में शिक्षितों की संख्या का इजाफा करना चाहते है| क्या महज कागजी रूप से शिक्षित हो जाने भर से देश विकास कर सकेगा| क्या महज कागजी शिक्षा युवाओं को उनका सुनहरा भविष्य दे पायेगी| या उन्हें भविष्य के प्रति आशंकित और भयभीत होकर भटकने पर मजबूर करे देगी| ये सवाल आज हम सभी के समक्ष उभर कर आता है की किस तरह से युवाओं को उनका भविष्य दिया जाये|
    युवा समाज बनाता है और समाज युवा को | दोनों गाड़ी के दो पहिये है| यदि एक भी कमजोर पड़ता है या  दोनों में सामंजस्य नहीं होता है| तो गाड़ी भी सामान गति से आगे नहीं बढ़ सकती है| राष्ट्र भी तभी विकास कर सकता है जब व्यक्ति,परिवार और उनसे निर्मित समाज विकास करेगा| और समाज तभी  आगे बढेगा जब युवा बढेगा | 












 









No comments:

Post a Comment