Wednesday, June 12, 2013

मैला आँचल : बाया शहर (एक विद्यार्थी की नोट बुक )



                      
मैला आँचल : बाया शहर  (एक विद्यार्थी की नोट बुक )
                                                                                                          प्रकाश चन्द्र
“मैला आँचल” उपन्यास एम. ए . के दौरान पढ़ा था । इस उपन्यास को पढ़ने के दो कारण थे एक तो एम. ए.  के कोर्स में लगा था दूसरा जब भी उपन्यास पर बातचीत होती तो गोदान और मैला आँचल उस चर्चा के केंद्र बिन्दु होते । गोदान बी. ए. के दौरान पढ़ चुका था अब मैला आँचल को पढ़ने की इच्छा तीव्र हो रही थी । इन दो कारणों के अलावा एक और कारण भी था जो मुझे मैला आँचल को पढ़ने के लिए  प्रेरित कर रहा था वह था IAS के कोर्स में मैला आँचल का होना ।( आपके मित्र बिहार के हों और आप साहित्य के या फिर इतिहास के विद्यार्थी हों तो IAS के बारे में सोचना आपका लाज़मी है)।  एक दिन सर्दियों की गुनगुनी धूप की गर्माहट महसूस करते हुये में  पटेल चेस्ट से गुजर रहा था तभी कुमार वाली दुकान पर मेरी नज़र मैला आँचल की प्रति पर  गई वह भी पैपर बैक संस्करण पर मैंने तुरंत दाम पूछा यही कोई 100 से150 के बीच बताया(ठीक से याद नहीं }मैंने एक प्रति खरीद ली । खरीद लेने के बाद मैला आँचल को पढ़ने का एक अलग ही उत्साह था । यह उत्साह कुछ वैसा ही था जैसा बचपन में नई कक्षा में जाने के बाद लाई गई नई किताबों के प्रति होता था । अब मैला आँचल की प्रति मेरी टेबल पर थी और मैं उसे पढ़ने को बेचैन । मैंने उसी रात पढ़ना शुरू किया और पढ़ते-पढ़ते 20-25 पेज पढे ही थे की आगे पढ़ने का मन नहीं हुआ । जबकि अक्सर मैं पहली बैठकी में किसी भी उपन्यास के 50-60 पेज पढ़ ही जाता हूँ । लेकिन मैला आँचल जैसे बहुपठित और चर्चित उपन्यास को में 20-25 पेज के ऊपर नहीं पढ़ पाया। क्यों नहीं पढ़ पाया यह मेरे लिए तब सोच पाना मुश्किल था लेकिन एक कारण था  मैला आँचल के आरंभ में जो टोलियाँ आती है ,रेणु ने जिस प्रकार उनका वर्णन किया उसे समझ पाना मेरे लिए तब थोड़ा मुश्किल काम था । क्योंकि न तो पहाड़ में इस प्रकार की टोलियाँ होती है न ही इतना बड़ा जातीय कुचक्र ।  दिल्ली में रहा तो वहाँ भी टोली बाज़ियाँ नहीं देखी न ही सुना की फलां यादव टोली का है फलां ब्राह्मण टोली का...... हाँ, ये जरूर सुना और देखा की वो फलां पार्टी का है वो फलां का....... ।
 एम. ए. करने के बाद दिल्ली से निकला और एक छोटे से शहर के ठीक ठाक विश्वविद्यालय में पढ़ने आ गया । एम. ए. खत्म करते-करते मैंने मैला आँचल पढ़ लिया, सिर्फ पढ़ा ही था कोर्स में होने के दबाव से, लेकिन समझ नहीं पाया था टोलियों का गणित । ( दरसल टोलियों की राजनीति ही है, मैला आँचल को समझने और खोलने की कुंजी)।  जब आया तो हिंदी की एक लेखिका जिस तरह दहेज में कामायनी लाई थी उसी तरह में भी मैला आँचल लगेज में ले आया । शहर में अपने ठिकाने पहुँचा तो बड़ा अच्छा लगा अक्सर जैसा दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रहने वाले लोगों को शांत और छोटे शहरों में आकर लगता है । कुछ महीने बीते देखते- देखते एक साल बीत गया मैं भी नए रंग में घुलने लगा । दिल्ली अब दूर थी पहाड़ सिर्फ स्मृतियों में ही था । मैं उस छोटे शहर के मिज़ाज को समझने की कोशिश ही कर रहा था । क्योंकि वहाँ न कोई फलां फलां पार्टी का था न किसी का कोई अपना...... वहाँ थे तो लोग सिर्फ टोलियों के । टोलियाँ देखी तो फिर एक बार मैला आँचल निकाल लिया  और पहली बैठकी मैं करीब 80 पेज पढ़ गया क्योंकि अब में टोलियों को समझ ही नहीं देख भी रहा था इसलिए अब मुझे “मैला आँचल” को समझने में ज्यादा मुश्किल नहीं हुई । मैला आँचल के कुछ अंश छोटे शहर की उन टोलियों के लिए , जिनको देख कर ..... मैला आँचल की टोलियों के गणित को समझ पाया ।मैं  भी आज एक टोली का ही सदस्य हूँ  किसी के टोले में नहीं होने वालों का भी एक टोला होता है जैसे बिना विचारधारा वाले लोगों की भी एक विचार धारा होती है कुछ वैसे ही ।
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........मालिकटोले से यह खबर राजपूतटोली पहुँची-कायस्थटोली के विश्वनाथप्रसाद और ततमाटोली के बिरंची को मलेटरी के सिपाही पकड़कर ले गए हैं। ठाकुर रामकिशन सिंह बोले, ‘‘इस बार तहसीलदारी का मजा निकलेगा। जरूर जमींदार लगान वसूल कर खा गया है। अब बड़े-घर की हवा खाएँगे बच्चू !’’
यादवटोली के लोगों ने खबर सुनते ही बलिया उर्फ बालदेव को गिरफ्तार कर लिया। भागने न पाए ! रस्सी से बाँधी ! पहले ही कहा था कि यह एक दिन सारे गाँव को बँधवाएगा।
तहसीलदार विश्वनाथप्रसाद एक सेर घी, पाँच सेर बासमती चावल और एक खस्सी लेकर डरते हुए मलेटरीवालों को डाली पहुँचाने चले, बिरंची को साथ ले लिया। बोले, ‘‘हिसाब लगाकर देख लो, पूरे पचास रुपए का सामान है। यह रुपया एक हफ्ता के अन्दर ही अपने टोले और लेबिन के टोले से वसूल कर जमा कर देना। तुम लोगों के चलते...।’’

मलेटरीवाले कोठी के बगीचे में हैं। बगीचे के पास पहुँचकर विश्वनथप्रसाद ने जेब से पलिया टोपी निकारकर पहन ली और कालीथान की ओर मुँह करके मां काली को प्रणाम किया, ‘‘दुहाई माँ काली!’’

बगीचे में पहुँचकर तहसीलदार साहब ने देखा, दो बैलगाड़ी हैं; बैल घास खा रहे हैं; मलेटरीवाले जमीन पर कम्बल बिछाकर बैठे हैं। ऐं....। मुढ़ी फाँक रहे हैं ! और बहरा चेथरू भी कम्बल पर ही बैठकर मूढ़ी फाँक रहा है !
‘‘सलाम हुजूर !’’
बिरंची ने सामान सिर से नीचे उतारकर झुककर सलाम किया, ‘‘सलाम सरकार !’’..... बकरा भी मेमिया उठा।

‘‘आ रे, यह क्या है ? आप कौन हैं ?’’ एक मोटे साहब ने पूछा।
‘‘हुजूर, ताबेदार राजा पारबंगा का तहसीलदार है, मीनापुर सर्किल का।’’
‘‘, आप तहसीलदार हैं ! ठीक  बात ! हम लोग डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का आदमी है। यहाँ पर एक मैलेरिया सेंटर बनेगा। ऊपर से हुकुम आया है, यही बागान का जमीन में। मार्टिनसाहब डिस्ट्रिक्ट बोर्ड को यह जमीन बहुत पहले दे दिया।’’
तहसीलदार साहब फिर एक बार सलाम करके बैठ गए। बिरंची हाथ जोड़े खड़ा रहा। राजपूतटोली के रामकिरपालसिंह जब कोठी के बगीचे में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि बगीचे के पच्छिमवाली जमीन की पैमाइश हो रही है; कुछ लोग जरीब की कड़ी खींच रहे हैं, टोपावाले एक साहब तहसीलदार साहब से हँस-हँसकर बातचीत कर रहे हैं।
और अन्त में यादवटोली के लोग बालदेव के हाथ और कमर में रस्सी बाँधकर हो-हल्ला मचाते हुए आये। उसकी कमर में बँधी रस्सी को सभी पकड़े हुए हैं। फिराकी-सुराजी को पकड़ने वालों को सरकार बहादुर की ओर से इनाम मिलता है- एक हजार, दो हजार, पाँच हजार !  साहब तो देखते ही गुस्सा हो गए, ‘‘क्या बात है ? इसको क्यों बाँधकर लाया है ? इसने क्या किया है ?’’
‘‘हुजूर, यह सुराजी बालदेव गोप है। दो साल जेहल खटकर आया है; इस गाँव का नहीं, चन्नपट्टी का है। यहाँ मौसी के यहाँ आया है। खध्धड़ पहनता है, जैहिन्न बोलता है।’’
‘‘तो इसको बाँधा है काहे ?’’
‘‘अरे बालदेव !’’ साहब के किरानी ने बालदेव को पहचान लिया,’’ अरे, यह तो बालदेव है। सर, रामकृष्ण कांग्रेस आश्रम का कार्यकर्ता है; बड़ा बहादुर है।’’
 यादवों के बन्धन से मुक्ति पाकर बालदेव ने साहब और किरानी को बारी-बारी सेजाय हिन्दकिया। साहब ने हँसते हुए कहा, ‘‘आपका गाँव में मलेरिया सेंटर खुल रहा है। खूब डाक्टर आ रहा है। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का तरफ से मकान बनेगा। लेकिन बाकी काम तो आप लोगों की मदद से ही होगा।’’

तहसीलदार साहब ने जमींदार खाते और नक्शे को तजवीज करके कहा, ‘‘हजूर जमीन एक एकड़ दस डिसमिल है।’’
ठाकुर रामकिरपाल को अब तक साहब को सलाम करने का भी मौका नहीं मिला था। विश्वनाथप्रसाद  ने बाजी मार ली। जिन्दगी में पहली बार सिंहजी को अपनी निरक्षता पर ग्लानि हुई। सचमुच विद्या की महिमा बड़ी है।
लेकिन भगवान ने शरीर दिया है, उच्चजाति में जन्म दिया है। इसी के बल पर बहुत बाबू-बबुआन, हाकिम हुक्काम और अमला-फैला से हेलमेल हुआ, जान-पहचान हुई। मौका पाते ही सलाम करके जोर से बोले, ‘‘जै हो सरकार की ! पबली को भलाय के वास्ते इतना दूर से कष्ट उठाकर आया है, और हम लोग हुजूर का कोई सेवा नहीं कर सके। गुसाईं जी रमैन में कहिन हैं- धन्य भाग प्रभु दरशन दीन्हा.....।’’ हुजूर सेवक का नाम रामकिरनपाल सिंघ वल्द गरीबनेवाजसिंह, मोत्ताफा, जात राजपूत मोकाम गढ़बुन्देल राजपूत हाल मोकाम मेरीगंज।’’……….
नोट – अगर रेणु से कुछ टोलियों छुट गई हो तो मित्रों समय और स्थान के हिसाब से आप खुद ही जोड़ लें ।

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