Wednesday, August 19, 2015

हिंदी के नाम पर होने वाले सम्मेलनों की असल मंशा क्या है ?













हिंदी की वैश्विक उन्नति और प्रचार-प्रसार के लिए विश्व हिंदी सम्मेलन के नाम पर एक बड़ा आयोजन किया जाता है। जिसका उद्देश्य हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाना है और हिंदी में विज्ञान और तकनीकी ज्ञान को बढ़ावा देना है । इस नेक सोच के साथ प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा' के तत्वाधान में 10-12 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित किया गया था । इस सम्मेलन का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के द्वारा किया गया। तब से लेकर अब तक देश विदेश में 9 सम्मेलन हो चुके हैं 10 वां  विश्व हिंदी सम्मेलन 10 से 12 सितंबर 2015  को भोपाल में होने जा रहा है । लेकिन नेक मंशा और उद्देश्य के साथ आरंभ हुआ यह आयोजन अब सिर्फ कुछ राजनेताओं और संबंधों का आयोजन बनकर रह गया ।  कहीं न कहीं अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों से भटक गया है । जिसके कई कारण हैं ।   
अब सवाल उठता है कि जिन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर हिंदी के नाम पर इस तरह के वैश्विक आयोजनों की शुरुआत की गई थी, वह उनको पूरा करने में कितना सफल हो सके हैं । नागपुर (भारत) से लेकर पोर्ट लुई (मॉरीशस),  लंदन (ब्रिटेन) और न्यूयार्क (अमरीका) की यात्रा तय करने के वावजूद  हिंदी आज वैश्विक स्तर पर कहाँ खड़ी है ? विश्व को छोड़ दीजिए भारत में ही हिंदी की क्या स्थिति है ?  भारत में एक खास वर्ग हिंदी जानना गर्व नहीं बल्कि शर्म की बात समझता है । हिंदी के साथ हीनताबोध को जोड़ कर देखा जाता है । अगर इस बात को थोड़ा कठोर होकर कहा जाए तो हिंदी भारत में या तो गरीबों की भाषा है या फिर बाजार की । इससे ज्यादा और कुछ नहीं । इन आयोजनों और हिंदी के नाम पर बने संस्थानों की  भूमिकाओं और कार्यों की पड़ताल करना आवश्यक है । हिंदी की वर्तमान स्थिति तथा दशा- दिशा को देखकर इस तरह के आयोजनों को लेकर दिमाग में कुछ प्रश्न उठते हैं । हिंदी के नाम पर होने वाले राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और संगोष्ठियों से हिंदी का कितना विकास और फिर प्रचार-प्रसार होता ? हिंदी में ज्ञान निर्माण की कोशिशों में इनकी क्या भूमिका होती है ? हिंदी के बड़े–बड़े सम्मेलन सिर्फ रस्म- अदायगी भर तो नहीं रह गए हैं ? हिंदी भाषा का इन सम्मेलनों से कुछ भला हुआ है ? इन सम्मेलनों के बड़े-बड़े उद्देश्यों पर कितना अमल होता है? क्या इतने बड़े पैमाने पर किए जाने वाले सम्मेलनों की मंशा हिंदी की उन्नति है या फिर कुछ लोगों की निजी उन्नति ? ये सम्मेलन फैमिली टूर भर बनकर तो नहीं रह गए हैं ? या वाकई बड़े उद्देश्य की सिद्धि के लिए ऐसे आयोजन किए जाते हैं ? इन प्रश्नों पर अब  विचार करना जरूरी है । 
 अब अगर बात की जाए 10वे विश्व हिंदी सम्मेलन की तो इस सम्मेलन का मुख्य विषय है- हिंदी जगत : विस्तार एवं संभावनाएँ ।हिंदी जगत का विस्तार और संभावनाओं पर विचार करने से पहले यह देखना होगा कि पिछले 9 विश्व हिंदी सम्मेलनों से हिंदी का कितना विकास हुआ है । क्या आज भी हम भाषाई गुलामी से मुक्त हो पाए हैं ? क्या हिंदी को लेकर हम वाकई गंभीर हैं? या फिर सिर्फ हम हिंदी को ढोह रहे हैं ? इन सब प्रश्नों पर विचार करना होगा तभी विस्तार और संभावनाओं पर बात हो सकती है । यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि किसी भी भाषा की ज्ञानात्मक गरीबी का उस समाज की आर्थिक गरीबी से सीधा संबंध होता है । अगर वाकई इस तरह के आयोजन समर्पित भाव से हिंदी के लिए कुछ करना चाहते हैं तो उन्हें हिंदी को ज्ञानात्मक स्तर समृद्ध करना होगा । हिंदी को विज्ञान और तकनीकी से जोड़ना होगा । साथ ही जब तक  हिंदी के प्रति खास तरह की लापरवाही को खत्म नहीं किया जाएगा तब तक इस तरह के आयोजनों से हिंदी का कोई भला नहीं होगा । न ही साल में एक बार हिंदी पखवाड़ा मनाने से होगा।   





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